रविवार, 14 जनवरी 2018

मकर संक्रांति


'तमसो मा ज्योतिर्गमय' यानी की... हे सूर्य! हमें भी अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो... सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति के त्योहार का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व माना गया है.. वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है.. विज्ञान के मुताबिक मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है.. हिंदू धर्म के मुताबिक महीने को दो पक्षों में बांटा गया है पहले पक्ष को कृष्ण पक्ष कहा जाता है तो दूसरे पक्ष को शुक्ल पक्ष.. इसी तरह साल को भी दो भागों में बांटा गया है.. पहला भाग को उत्तरायण कहते हैं और दूसरे को दक्षिणायन... यानी दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है... मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर ढलता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहा जाता है.. मकर संक्रांति का त्योहार सूर्य के उत्तरायन होने पर मनाया जाता है... हर साल 14 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है... कभी-कभी यह एक दिन पहले या बाद में यानि 13 या 15 जनवरी को भी मनाया जाता है.. लेकिन ऐसा कम ही होता है.. सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है.. इस राशि परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं.. इसी दिन से हमारी धरती एक नए वर्ष में और सूर्य एक नई गति में प्रवेश करता है.. 14 जनवरी ऐसा दिन है, जब धरती पर अच्छे दिन की शुरुआत होती है.. ऐसा इसलिए कि सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर को गमन करने लग जाता है.. जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों का असर खराब माना गया है... लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करते लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं.. मकर संक्रांति का महत्व हिंदू धर्म के लिए वैसा ही है जैसे वृक्षों में पीपल, हाथियों में ऐरावत और पहाड़ों में हिमालय है.. मकर संक्रांति का संबंध सीधा पृथ्वी के भूगोल और सूर्य की स्थिति से है.. जब भी सूर्य मकर रेखा पर आता है, वह दिन 14 जनवरी ही होता है.. इसलिए इस दिन मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है.. ज्योतिष की दृष्ट‍ि से देखें तो इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है और सूर्य के उत्तरायण की गति प्रारंभ होती है.. जनवरी के शुरुवात में पूरी दुनिया नए वर्ष का स्वागत करती है और इसके बाद साल का पहला त्यौहार मकर संक्रांति आता है.. इसलिए इस त्यौहार का महत्व और भी बढ़ जाता है.. मकर संक्रांति के दिन से बसंत ऋतु की शुरुवात मानी जाती है..  और दिन की लम्बाई बढ़नी और रात की लम्बाई छोटी होनी शुरू हो जाती है..

यह त्यौहार पूरे देश में फसलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है.. खरीफ की फसलें कट चुकी होती है और खेतो में रबी की फसलें लहलहा रही होती है.. पूरे देश में इस समय ख़ुशी का माहौल होता है.. सही मायने से देखा जाए तो यह भारत में एक महापर्व की तरह मनाया जाता है, जहां एक ही मान्यता अपने अंदर विभिन्न रीति-रिवाजों और परंपराएं समेटे हुए है. उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा में इस समय नई फसलों का स्वागत किया जाता है और लोहड़ी पर्व मनाया जाता है.. जबकी असम में बिहू के रूप में इस पर्व को हर्ष-उल्लास के साथ मनाया जाता है.. तमिलनाडु में पोंगल, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल में संक्रांति, उत्तर प्रदेश, बिहार में खिचड़ी पर्व के रूप के मनाया जाता है... हर प्रांत में इसका नाम और मनाने का तरीका अलग-अलग होता है.. अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार इस पर्व के पकवान भी अलग-अलग होते हैं.. लेकिन दाल और चावल की खिचड़ी इस पर्व की प्रमुख पहचान होती है.. मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से गुड़ और घी के साथ खिचड़ी खाने का महत्व है.. इसेक अलावा तिल और गुड़ का भी मकर संक्राति पर बेहद महत्व है.. घरों में तिल और गुड़ के लड्डू और तिल के अन्य व्यंजन भी बनाए जाते हैं.. वैसे भी हमारे समाज में हर त्योहार पर विशेष पकवान बनाने और खाने की परंपराएं भी प्रचलित है.. मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष रूप से तिल व गुड़ के पकवान बनाने व खाने की परंपरा है.. कहीं पर तिल और गुड़ के स्वादिष्ट लड्डू बनाए जाते हैं तो कहीं चक्की बनाकर तिल और गुड़ का सेवन किया जाता है.. तिल और गुड़ की गजक भी लोग खूब पसंद करते हैं.. मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ का ही सेवन किया जाता है इसके पीछे भी वैज्ञानिक आधार है..  दरअसल सर्दी के मौसम में जब शरीर को गर्मी की आवश्यकता होती है तब तिल और गुड़ के व्यंजन यह काम बखूबी करते हैं, क्‍योंकि तिल में तेल की प्रचुरता रहती है जिसका सेवन करने से हमारे शरीर में पर्याप्त मात्रा में तेल पहुंचता है और जो हमारे शरीर को गर्माहट देता है.. इसी प्रकार गुड़ की तासीर भी गर्म होती है.. यही कारण है कि मकर संक्रांति के अवसर पर तिल और गुड़ के व्यंजन प्रमुखता से खाए जाते हैं.. सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारी जल्दी लगती है.. इसलिए इस दिन गुड और तिल से बने मिष्ठान खाए जाते है.. इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्व के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी मिलते हैं.. इसलिए इस दिन खासतौर से तिल और गुड़ के लड्डू खाए जाते है.. इस दिन कुछ लोग सुबह उठकर तिल का उबटन लगाकर स्नान करते हैं..

ठंडी-ठंडी सुबह... हल्की-हल्की सूर्य की किरणे... सुहावना मौसम और मकर संक्रांति का त्यौहार.. खुशनुमा माहौल बना देता है.. पौराणिक कथाओं के मुताबिक कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर आते हैं.. ज्योतिष की दृष्टि से सूर्य और शनि का तालमेल संभव नही है, लेकिन सूर्य खुद अपने पुत्र के घर जाते है... इसलिए पुराणों में यह दिन पिता पुत्र के संबंधो में निकटता के रूप में मनाया जाता है.. शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है.. ऐसा कहा जाता है की इसी दिन भगवान विष्णु ने मधु कैटभ से युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी.. भगवान विष्णु ने मधु के कंधो पर मंदार पर्वत रख कर उसे दबा दिया था.. मां दुर्गा ने महिषासुर का वध करने के लिए इसी दिन धरती में कदम रखा था.. इसलिए यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है.. यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तब सूर्य देवता उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी.. कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन में आया.. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर से मिली थीं.. इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है.. महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही स्वेच्छा से शरीर का परित्याग किया था.. कहा जाता है कि उत्तरायण में देह छोड़ने वाली आत्माएं या तो कुछ काल के लिए देवलोक में चली जाती हैं या पुनर्जन्म के चक्र से उन्हें छुटकारा मिल जाता है.. जबकी दक्षिणायन में देह छोड़ने पर बहुत काल तक आत्मा को अंधकार का सामना करना पड़ सकता है.. भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है ऐसे में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं.. इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है.. मकर संक्रांति को स्नान और दान का पर्व भी कहा जाता है.. इस दिन तीर्थों एवं पवित्र नदियों में स्नान का बेहद महत्व है साथ ही तिल, गुड़, खिचड़ी, फल और राशि अनुसार दान करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है.. ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन किए गए दान से सूर्य देवत प्रसन्न होते हैं... मकर संक्रांति का त्योहार उत्साह से भी जुड़ा हुआ है.. इस दिन पतंग उड़ाने का भी विशेष महत्व होता है.. इस दिन लोग बड़ी तैयारी के साथ पतंगबाजी करते हैं.. हिन्दी सिनेमा से लेकर टीवी सिरियलों में भी मकर संक्रांति के दिन पतंगबाजी के बड़े-बड़े आयोजन दिखाए जाते रहे हैं.. जगह जगह पर सुबह सूर्य उदय के साथ ही पतंग उड़ाना शुरू हो जाता है... पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना। ये समय सर्दी के मौसम का होता है और इन मौसम में सुबह के सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्धक और त्वचा और हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है।

हिन्‍दू धर्म के विभिन्‍न अन्‍य त्‍यौहारों की तरह ही मकर संक्रांति भी हिन्‍दू धर्म का प्रमुख त्‍यौहार है। मकर संक्रांति को मनाने के संदर्भ में कई तरह की बाते और तथ्‍य कहे जाते हैं.. उत्तर प्रदेश में यह अवसर दान पर्व के रूप में मनाया जाता है.. इलाहाबाद में इस पर्व को माघ मेले के नाम से जाना जाता है.. माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रांति से शुरू होकर शिवरात्रि तक चलता है.. संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान के बाद दान को महत्वपूर्ण माना जाता है.. 14 दिसम्बर से 14 जनवरी तक पूरे एक महीने किसी भी अच्छे काम को अंजाम भी नहीं दिया जाता है.. मसलन शादी-ब्याह नहीं किये जाते हैं.. लोगों में ऐसा विश्वास है कि 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है.. उत्तर प्रदेश में यह पर्व खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस दिन तिल और तिल से बनी चीजों के दान के साथ खिचड़ी का दान भी विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है.. लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ देते हैं और कहते हैं तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो.. मकर संक्रांति सूर्य उपासना का विशेष पर्व है. इस दिन से सूर्य उत्तरायण होना शुरू होते हैं और इसके बाद से धरती के उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु की ठंडक में कमी आनी शुरू होती है. मकर संक्रांति के दिन तिल दान का अपना एक अलग ही महत्व है.. इस दिन विशेष कर तिल दान किया जाता है. इस दिन लोग पानी में तिल डालकर स्नान करते हैं. साथ ही स्नान के बाद आग में तिल का तेल या तिल के पौधे के सूखे डंठल डालकर हाथ सेंकते हैं... मकर संक्रांति के दिन महाराष्ट्र में सुहागन महिलाएं पुण्यकाल में स्नान कर तुलसी की आराधना और पूजा करती हैं... इस दिन महिलाएं मिट्टी से बना छोटा घड़ा में तिल के लड्डू, सुपारी, अनाज, खिचड़ी और दक्षिणा रखकर दान का संकल्प लेती हैं... खासकर गुजरात में मकर संक्रांति के दिन पतंगबाजी और खूब मौज-मस्ती करते है लोग है. क्या छोटा क्या बड़ा सभी इस दिन पतंग उड़ाने में मशगूल रहते हैं... मकर संक्रांति के दिन पूरा परिवार घर की छत पर सामूहिक रूप से भोजन करते हैं.. यहां तिल और गुड़ के लड्डुओं के अंदर सिक्के रखकर दान करने की भी परंपरा है... मकर संक्रांति के दौरान सिंधी समाज में कन्याओं को दान दिया जाता है... इस दिन पूर्वजों के नाम पर बेटियों को आटे के लड्डू, तिल के लड्डू, चिक्की और मेवा दान स्वरूप दी जाती है. वहीं बंगाली समाज में भी विशेष रूप से संक्रांति का महापर्व मनाया जाता है. बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है.. यहां गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है.. इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है.. लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं.. वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रान्ति को यहां लोगों की अपार भीड़ होती है..

फ्लॉप 'पॉलिटिकल सितारे'


साल 2019 में देश की राजनीति में बड़े बदलावों के तौर पर देखा जाएगा। इस साल में में बड़े से बड़े दिग्गजों को मुंह की खानी पड़ी तो वहीं कई दिग्गजों ने अपने जीत का परचम लहराया। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश से लंबे समय से चली आ रही सपा-बसपा संस्कृति का अंत हुआ और बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई। इस साल राजनीतिक कद के लिए बाप और बेटे की लड़ाई तक देखी गई। देश मे जयललिता जैसी दिग्गज राजनेता को खोया। इस साल में कई राजनेता तो सुपरहिट हुए तो कई बुरी तरह फ्लॉप हुए। हम आपको 2017 के फ्लॉप राजनेताओं की कहानी बता रहे हैं। *धरतीपुत्र, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने यूं तो सियासत में कई उतार चढ़ाव देखे हैं... सियासी उठापटक से गुजरे हैं, कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं... लेकिन पिछली दीपावली के पहले से लेकर अब इस दीपावली तक.. इस एक साल के सियासी उठापटक ने नेताजी को कुछ परेशान सा कर दिया... साथ ही सियासी सफर में नेताजी के साथ साए की तरह रहने वाले शिवपाल सिंह यादव भी राजनीतिक हाशिए पर हैं.. ऐसे में इनकी दीपावली कैसी है... ये जानना भी बड़ा दिलचस्प है... देखिए रिपोर्ट

मुलायम सिंह यादव
मुलायम सिंह यादव के साथ वो हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था यूपी के सबसे बड़े सियासी परिवार में ऐसा रार चला कि अखिलेश यादव ने आपातकालीन राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अधिवेशन में सदस्यों के भारी समर्थन के साथ पिता मुलायम सिंह को गद्दी से उतार कर खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। मुलायम सिंह यादव ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक वक्त ऐसा आएगा जब उनका बेटा उन्हें कुर्सी से उतार देगा लेकिन ऐसा हुआ। वहीं अखिलेश यादव ने नेतृत्व में भी समाजवादी पार्टी को बड़ी हार मिली। पूरे साल मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव का समझौता कराने में लगे रहे। यूपी में समाजवादी पार्टी को बुरी दुर्गती देखनी पड़ी है।
START WITH- मन से हैं मुलायम
मजबूत इरादों वाले नेता जी यानि मुलायम सिंह यादव.. जिनसे उनके समर्थक जितना प्यार करते हैं... उनके विरोधी उतना ही घबराते हैं... कहा जाता है कि नेताजी कब कौन सा फैसला लेंगे... और क्या करेंगे... ये किसी को पता नहीं रहता... दाएं हाथ से क्या करेंगे ये बाएं को नहीं पता होता... नेताजी ने अपने विरोधियों को ऐसी ऐसी पटखनी दी हैं कि आज भी जब पुरवइया चलती है तो दर्द उठता है... लेकिन नेताजी को बेटा ऐसा दर्द देगा ये नेताजी ने सपने में भी नहीं सोचा था... नेताजी जी के रहते ही अखिलेश ने रामगोपाल की मौजूदगी में खुद को सपा का अध्यक्ष बना लिया... विधानसभा चुनाव में प्रचार से नेता जी ने खुद को और शिवपाल ने खुद को दूर रखा था.... शिवपाल ने कई बार हार का दर्द बयां किया... ठीकरा अखिलेश पर फोड़ा... BYTE--  शिवपाल सिंह यादव, विधायक
नेताजी के मजबूत इरादे भी बेटे के सामने कमजोर पड़ गए... शिवपाल चाहते थे.. कि वो नई पार्टी बनाएं, नेताजी उसके सर्वेसर्वा बनें... लेकिन हमने आपको पहले ही बताया कि नेताजी क्या सोचते हैं, क्या करते हैं.. कि उनके सिवा कोई नहीं जानता... जब शिवपाल का दबाव बहुत बढ़ा तो नेता जी ने पीसी तो की... लेकिन नई पार्टी का ऐलान नहीं किया...
मुलायम सिंह यादव, (जो बाप का नहीं हुआ)
ये नेताजी का दर्द ही था जो जुबान पर आ गया... लेकिन सबसे बड़ा दर्द था वो शिवपाल को था... एक वक्त में शिवपाल के इशारे के बिना सपा में पत्ता तक नहीं हिलता था... जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे, तो अप्रत्यक्ष तौर पर सत्ता शिवपाल ही चलाते थे.. अधिकारियों की पोस्टिंग से लेकर मंत्रियों के मंत्रालय तक शिवपाल ही तय करते थे... लेकिन भतीजे के बढ़ते कद के आगे शिवपाल छोटे होते चले गए... और इतने छोटे हुए कि आज सपा में उनकी कोई पूछ  नहीं... टीम अखिलेश ही अब सपा है... मुलायम सिंह को अखिलेश ने सपा का संरक्षक बना दिया... यानि नेताजी को जबरिया रिटायरमेंट... इतना ही नहीं हाल ही में घोषित हुआ सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नेताजी और शिवपाल को जगह तो छोड़िए कहीं.. उनके नाम तक का जिक्र नहीं है.. इससे एक बार फिर साफ हो गया कि शिवपाल और मुलायम कालीन सपा का अब अस्तित्व ही नहीं है... अखिलेश ने दीवाली से पहले ही दोनों को फुस्स कर दिया... शिवपाल जसवंतनगर से विधायक और पूर्व मंत्री के तमगे के सिवा सपा में कुछ नहीं.... शिवपाल सपा में एक ऐसे किनारे पर खड़े हैं... जहां से बीच में आने की कोई गुंजाइश ही नहीं... लेकिन चाचा ने भतीजे को अध्यक्ष बनने पर बधाई भी दी....
अब सवाल ये है कि सपा में हाशिए पर चले गए ये दोनों भाई, सियासत के ये दोनों धुरंधर आज हैं कहां... दोनों का सपा में वजूद बचा भी है या नहीं... या बीजेपी के आडवाणी और मुरली मनोहर की तरह ये भी अब मूक मार्गदर्शक हैं...  क्या 2019 के आम चुनाव और उससे पहले स्थानीय निकाय चुनाव में मुलायम सिंह की सपा में क्या भूमिका होगी, प्रत्याशियों के चयन, टिकटों के वितरण में क्या नेताजी की चलेगी... या अब सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव जो चाहेंगे वहीं होगा... ना खाता ना बही जो अखिलेश कहें वही सही... क्या अब सपा की यही स्थिति है.... ऐसे में मुलायम और शिवपाल की दिवाली कितनी बेरंग है ये शायद बताने की ज़रूरत नहीं है.... दोनों सियासी गुमनामी में जाते दिखाई दे रहे हैं... लेकिन क्या पता कि दिवाली के बाद नेताजी कोई ऐसा बम फोड़ें... ऐसा धमाका करें... कि उनकी धोबीपछाड़ से अखिलेश चारों खाने चित हो जाएं... अब आगे क्या होगा ये तो आगे ही पता चलेगा... लेकिन दीपावली में नेताजी की खुशी के लिए कोई वजह नहीं दिखती...
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*अखिलेश यादव की पहचान एक सांसद के तौर पर रही, मुलायम सिंह के बेटे के तौर पर रही, सपा के स्टार प्रचारक, सपा के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर रही... लेकिन ये दीपावली उनके लिए इस बार ज्यादा खास है क्योंकि वो सपा के पांच साल के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं... और नई ऊर्जा के साथ सपा में जान फूंक रहे हैं...
अखिलेश यादव का फॉर्मूला फ्लॉप
अखिलेश यादव का फॉर्मूला फ्लॉप रहा अखिलेश यादव अपने पिता और चाचा को दरकिनार कर यूपी को जितने का दांव लगाया लेकिन बुरे तरीके से फेल हो गए। यूपी विधासभा चुनाव में अखिलेश यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी को ऐसी हार मिली की जिसकी उन्होंने कल्पना कभी भी नहीं की थी। विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने समाजवादी पार्टी को बुरी तरह से पटखनी दी। बात यही खत्म नहीं हुई अखिलेश यादव के कई करीबियों ने बीजेपी का दामन थाम लिया। अखिलेश ने फिर भी अपने आप को संभालने की कोशिश की लेकिन 2017 के अंत तक उनकी पार्टी को निकाय चुनावों में भी हार का सामना करना पड़ा। साल 2017 में समाजवादी पार्टी के अंदर खूब कलह हुआ जिसको रोकने में अखिलेश यादव नाकामयाब रहे।
शिवपाल यादव को भतीजे ने दिया जोर का झटका राजनीति के माहिर खिलाड़ी और लंबे समय तक अपने भाई मुलायम सिंह यादव का झंडा बुलंद करते रहे शिवपाल यादव को उनके भतीजे ने जोर का झटका दिया। पारिवारिक कलह की वजह से समाजवादी पार्टी यूपी में हार गई वहीं समाजवादी पार्टी में शिवपाल का कद भी कुछ नहीं रहा। शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच लंबे समय तक 'शीतयुद्ध' चला जो अभी भी खत्म नहीं हुआ है। शिवपाल यादव अभी यूपी में पार्टी को बढ़ाने और खुद के लिए समाजवादी पार्टी में ओहदा दोनों के लिए लड़ रहे हैं। एक वक्त था जब यूपी की राजनीति में शिवपाल यादव की तूती बोलती थी।..  START WITH SONG- यूपी को अखिलेश पसंद है...
ये वो गाना है जो 2017 के विधानसभा चुनावों में आपने बहुत बार सुना होगा... यूपी की जनता ने अखिलेश का साथ नहीं दिया... उनकी और राहुल गांधी की जोड़ी यूपी में धमाल नहीं कर पाई... सपा 47 तो कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई... बीजेपी की आँधी में दोनों नेता धुआं हो गए....  अखिलेश ने लोगों को दुआएं मांगी और अपनी हार को स्वीकार किया...
SONG- अच्छा चलता हूं दुआओं में याद रखना
सपा में पारिवारिक संग्राम से लाख इनकार किए गए हों... लेकिन राजनीति से कोई मतलब ना रखने वाला शख्स भी जानता है कि सपा में ऑल इज़ वेल नहीं है.. अखिलेश मुलायम और शिवपाल के बीच की रार कई बार साफ दिखी... सीएम की कुर्सी जाने से पहले ही अखिलेश ने राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी हथिय़ा ली थी.... लेकिन चुनाव हारने के बाद चाचा शिवपाल ने कई बार कहा कि हार के लिए भतीजा जिम्मेदार है... उसी ने लुटिया डुबो दी... और अब अध्यक्ष का पद नेताजी को वापस कर दें.... BYTE- शिवपाल सिंह यादव
लेकिन चाचा शिवपाल के भतीजे अखिलेश नहीं माने... और वो अध्यक्ष बने रहे, साथ ही आगरा अधिवेशन में बाकायदा अखिलेश को पांच साल के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया... अखिलेश एक बार फिर बोले... सॉन्ग- अखिलेश यादव बोल रहा हूं...
अखिलेश ने  बड़ा ऐलान किया कि उनकी पत्नी और वर्तमान मे कन्नौज की सांसद डिंपल यादव चुनाव नहीं लड़ेंगी... यानि परिवारवाद के जो आरोप सपा पर लगते हैं.. अखिलेश उनसे खुद को अलग करना चाहते हैं... लेकिन सियासी जानकारों का कहना है कि ऐसा कहकर अखिलेश असल में अपनी राह आसान कर रहे हैं... और खुद कन्नौज से चुनाव लड़ेंगे... क्योंकि सपा के लिए कन्नौज हमेशा से ही सेफ सीट के तौर पर जाना जाता है... अखिलेश यादव नई ऊर्जा से लबरेज हैं... सपा के अध्यक्ष बन गए हैं... यानि नए सपा सुप्रीमो यानि नए नेताजी.... की इस बार की दीपावली कई मायनों में खास है... अखिलेश अब 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं... सपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी भी बन चुकी है... यानि अब टीम अखिलेश ही सपा की सर्वेसर्वा है... और अपने नेता अखिलेश के नेतृत्व में काम करेगी... 2017 की करारी हार के बाद अखिलेश यादव सपा को नए सिरे से खड़ा कर रहे हैं... दीपावली के खत्म होते ही प्रदेश में निकाय चुनाव की सरगर्मियां उफान पर होंगी... और हर दल नगर निकाय चुनाव में जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएगा... अखिलेश के लिए हैप्पी दीपावली के लिए कई वजह हैं... इसलिए अखिलेश यादव पूरी तरह खुश हैं..
मायावती का बुरा हाल
*बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की अगर बात करें... तो 2012 के बाद से 2017 तक उन्होंने खुशी से दीपावली नहीं मनाई.. इसके पीछे कई वजह हैं... आखिर 5 सालों से मायावती के लिए दीपावली क्यों ख़ास नहीं रही, क्यों उन्होंने उमंग के साथ ये दीपोत्सव नहीं मनाया...
मायावती का बुरा हाल
मायावती का बुरा हाल 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का बुरा हाल देखने के बाद मायावती ने साल 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से बहुत उम्मीदें लगा रखी थी लेकिन उनका सपना टूटा और उनको विधानसभा चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं मायावती पर यूपी में हिंसा कराने के आरोप भी लगे। हार का सिलसिला विधानसभा चुनाव तक ही नहीं रूका मायावती को निकाय चुनाव में भी हार का ही सामना करना पड़ा। अब फिर से मायावती पार्टी को खड़ा करने में लगी हुई हैं।
मायावती सॉन्ग
खुद को दलितों का सबसे बड़ा नेता, सबसे बड़ा रहनुमा, सबसे बड़ी हितैषी बताने वाली मायावती आज राजनीतिक हाशिए पर हैं... 2007.... ये वो साल था, जब मायावती ने तमाम पॉलिटिकल पंडितों के अनुमानों को ध्वस्त कर दिया था और प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ काबिज़ हुई थी.... 5 सालों की अपनी सरकार में मायावती का पत्थर प्रेम सबको दिखा... मायावती ने खुद अपनी और कांशीराम की कई मूर्तियां लगवाईं... लेकिन 2012 में माया बुआ के भतीजे अखिलेश ने ही अपनी बुआ को पटखनी दे दी... और खुद प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया... 2012.. यही वो साल था जब मायावती के राजनीतिक हाशिए पर जाने की शुरुआत हो गई... मायावती ने सोचा कि वो मेहनत करेंगी और प्रदेश की जनता 2014 के लोकसभा चुनाव में तो हाथी पर ही सवार होगी... लेकिन जनता इस बार तो मायावती को इतना बड़ा झटका दिया जिसके बारे में खुद मायावती ने कभी नहीं सोचा था... प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में मायावती की पार्टी बीएसपी का खाता तक नहीं खुला... और सियासत की पिच पर मायावती जीरो पर आउट हो गईं...  मायावती के लिए ये अबतक का सबसे बड़ा सियासी झटका था...  मायावती समझ नहीं पा रही थीं.. कि क्या करें... कैसे संगठन को मजबूत करें, कैसे जनता का खोया हुआ विश्वास हासिल करें... ये सोचते सोचते यूपी के विधानसभा चुनाव नज़दीक आ गए.. मायावती मुद्दों की तलाश कर रही थी... जीरो पर आउट होने के बाद मैदान में उतरते वक्त खिलाड़ी किस दबाव में होता है कि ये क्रिकेट को समझने वाले लोग जानते ही होंगे... लेकिन ये गेंद और बल्ले का खेल नहीं था... ये तो सियासी जंग थी... और माया के लिए करो या मरो की स्थिति.. इसी बीच बीजेपी के नेता और आज यूपी सरकार में मंत्री स्वाति सिंह के पति दयाशंकर सिंह ने मायावती पर अमर्यादित टिप्पणी कर दी... मायावती को लगा कि ये सही मौका है... दलितों के बीच में ये मैसेज देने का कि ये अपमान दलितों का है... उनकी नेता का है... मायावती ने अपनी माउज़र के सारे छर्रों को लगा दिया... कि जाओ मैदान में उतरो इसे चुनावी मुद्दा बना दो... इतना ही नहीं मायावती ने अपने इस दर्द को सदन में बयां किया...
MAYAWATI BYTE- 
लेकिन कभी सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन ना करने वाले बसपाई कुछ ज्यादा जोश में आ गए और उस वक्त के बड़े बसपाई नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी की अगुवाई में सड़कों पर उतर पड़े... लेकिन राजधानी की सड़कों पर ऐसे विवादित पोस्टर दिखे... जिसमें दयाशंकर के लिए अपशब्द लिखे थे... बसपाईयों ने भी नारों के साथ गालियां देने में कोई कोताही नहीं की.... और ये पूरा मामला गाली वर्सेस गाली का बन गया... लेकिन मायावती के इस प्लान को बीजेपी ने ऐसे फेल किया... कि पूरा मामला उल्टा हो गया.... और बीजेपी भी मैदान में उतरी... बीजेपी ये साबित करने में कामयाब हो गई.,. कि बसपाई नेताओं ने एक महिला का अपमान किया है... और ये सब मायावती के इशारे पर हुआ है....
अब मायावती 2017 की तैयारी में कूद गई... अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया... ताबड़तोड़ रैलियां की, सभाएं की... माया को लगा इस बार जनता उनके साथ आ जाएगी.... लेकिन जनता को तो छोड़िए.. अपनों ने ही मायावती का साथ नहीं दिया.... कभी मायावती के चरणों में ही सियासत तलाशने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीएसपी को टाटा कह दिया... और अकेले नहीं अपने समर्थकों के साथ... जय भीम बोलने वाले मौर्या इन दिनों जय श्री राम कर रहे हैं... और प्रदेश सरकार में मंत्री हैं.... कभी बीएसपी में ब्राह्मण समाज के सबसे बड़े नेताओं में से एक ब्रजेश पाठक भी अब प्रदेश सरकार में मंत्री हैं..... साथ ही कई और बसपाइयों ने भी मायावती को प्रणाम करके दूसरे दलों में भविष्य तलाशना शुरू कर दिया.... और मायावती 2017 के चुनावों में महज़ 19 सीटों पर सिमट गईं.... राजनीतिक गलियारों और पॉलिटिकल पंडितों ने मायावती के राजनीतिक भविष्य पर ही सवालिया निशान लगा दिए... माया इस गम से उबरती कि सबसे खासमखास, सबसे करीबी, हमराज़ नसीमुद्दीन ने बहन जी से खुद को अलग कर लिया... वो भी टेपबम फोड़कर... मायावती के करीबी नेता पूर्व मंत्री इन्द्रजीत सरोज भी हाथी से उतरकर साइकिल की सवारी करने लगे
USE SOME PART OF NASEEMUDDIN TAPE
मायावती अपनी हार से इस कदर बौखलाई हुई थी... कि उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा भी दे दिया.... और देश ने पहली बार मायावती का ऐसा रूप देखा था...
BYTE MAYA RAJYSABHA ISTEEFA
अब मायावती के पास खोने के लिए कुछ नहीं है... राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मायावती लोकसभा उपचुनाव लड़ेंगी या नहीं... लेकिन फिलहाल मायावती का पूरा फोकस नगर निकाय चुनाव पर है... और पहली बार मायावती की पार्टी बीएसपी निकाय चुनाव में ताल ठोक रही है.... कुल मिलाकर ये दीवाली मायावती के लिए कहीं से भी खास नहीं है...
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राजनैतिक रूप से हमेशा जागरूक रहे बिहार राज्य का सियासी ड्रामा इस जाते हुए वर्ष में काफी रोमांचक रहा. यहां नेताओं ने सीधे रास्‍तों पर भी कई ऐसी चालें चलीं, जिनसे राज्‍य में सत्ता का चेहरा तक बदल गया. जो युवराज सत्‍ता में थे, बेदखल हो गए. और जो विपक्ष में बैठे थे, वे सत्‍ता में आ गए. CBI को नया काम मिल गया. लोगों ने कई चेहरे देखे, जिन पर जांच एजेंसियों ने भ्रष्‍टाचार की मुहर लगाई. इस साल बिहार की राजनीति में जो हलचल हुई, उसकी धमक केंद्र तक सुनाई दी. नए समीकरण बने, और जो कभी दोस्‍त थे, वे प्रखर विरोधी बन गए, और साल के जाते-जाते कद्दावर नेता जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए. इसी के साथ नई सियासी जंग भी शुरू हुई, जिसका नेतृत्‍व विपक्ष के एक मजबूत युवा नेता के हाथ में है.
शरद यादव
शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता तक चली गई कभी देश की राजनीति के केंद्र में रहे शरद यादव के लिए साल 2017 कई मायनों में अच्छा नहीं रहा। इस साल के अंत उन्हें अपनी राज्यसभा सदस्यता तक गंवानी पड़ी। इतना ही नहीं बिहार के सीएम नीतीश कुमार से टक्कर लेने वाले शरद यादव को जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर बाद में उन्होंने जेडीयू पर दावा ठोका लेकिन उसमें भी फेल रहे और चुनाव आयोग ने उनकी मांगों को सिरे से नकार दिया। दरअसल बिहार में लालू यादव के साथ चल रही महागठबंधन की सरकार से बाहर होकर नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ मिलकर सरकार बना ली जिस वजह से शरद यादव नीतीश कुमार खफा हो गए और नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया लेकिन इस लड़ाई में शरद यादव फेल साबित हुए लेकिन हां समय- समय पर शरद यादव को आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव का साथ मिलता रहा। संभव है शरद यादव और लालू यादव मिलकर देश की राजनीति में कुछ नया खेल करने की कोशिश करें। दोनों मिलकर नए समीकरण तलाशने की कोशिश में लगे हुए हैं। महागठबंधन के टूटने और BJP के साथ नीतीश कुमार के जाने के बाद JDU में भी विरोध के स्वर मुखर हो गए. JDU के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव और राज्यसभा सांसद अली अनवर ने नीतीश के खिलाफ विद्रोह कर दिया. दोनों नेता खुलकर नीतीश के विरोध में आए. इसके बाद चुनाव आयोग में दोनों धड़ों ने खुद को असली JDU बताते हुए लड़ाई लड़ी. यह अलग बात है कि अंत में फैसला नीतीश कुमार के पक्ष में आया. लेकिन इस विरोध के कारण शरद यादव और अली अनवर को राज्यसभा की सदस्यता गंवानी पड़ी
लालू पर भारी पड़ा साल 2017
लालू पर भारी पड़ा साल 2017 आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के लिए साल 2017 अच्छा नहीं रहा। बिहार में लालू यादव की पार्टी सरकार में थी लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घुमा की आरजेडी सरकार से बाहर हो गई। नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ मिलकर सरकार बना ली। लालू यादव के दोनों बेटे जो बिहार में मंत्री थे अचानक सड़क पर संघर्ष करने को मजबूर हो गए। उधर रेलवे टेंडर घोटाले में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पटना में स्थित 3 एकड़ की बेनामी जमीन को प्रवर्तन निदेशालय ने जब्त कर लिया। साल 2017 में लालू यादव के ठिकानों पर रेड पड़ी। इतना ही पूरे लालू परिवार और उनके करीबियों को सीबीआई और ईडी के सामने कई मामलों में पेश होना पड़ा। साल के अंतिम दिनों में बिहार के दिग्गज नेता लालूप्रसाद यादव चारा घोटाले के एक मामले में अदालत द्वारा दोषी पाए जाने के बाद जेल भेज दिए गए. बिहार में सियासत अभी उबाल पर है. लालू के बेटे और पूर्व उपमुख्‍यमंत्री तेजस्‍वी यादव मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार पर जमकर आरोप लगा रहे हैं.



71 की कहानी

बात 1971 की है जब भारत के पूरब और पश्चिम दोनों में ही पाकिस्तान हुआ करता था। पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला बोलने वाले लोग थे जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में उर्दू जबान बोली जाती थी.. पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान में दो हजार किलोमीटर का फासला था, लेकिन ये एक ही मुल्क के दो हिस्से थे.. फौज, और सरकारी नौकरियों में पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों का दबदबा था.. जिसके चलते पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने बगावत कर दी... इस बगावत को दबाने के लिए पाकिस्तान की सेना ने मोर्चा संभाला.. 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना ने अपने ही मुल्क के बंगाली भाषी लोगों पर जुल्म ढाहना शुरू कर दिया... रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तानी फौज ने दो लाख महिलाओं से बलात्कार किया.. और लाखों बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया था.. इस कार्रवाई को पाकिस्तानी सेना ने आपरेशन सर्च लाइट का नाम दिया.. बांग्लादेश के लोगों ने जब पाकिस्तानी सरकार से थोड़ी आजादी चाही और अपने जीवन को अपने तरीके से नियंत्रित करने के लिए अपनी सरकार चाही, तो इस मांग को  पाकिस्तानी हुक्मरानों ने बर्बरतापूर्वक दबा दिया. जिसका परिणाम हुआ कि पूर्वी पाकिस्तान के आवाम उठ खड़े हुए और बांग्लादेश के रूप में खुद को आजाद करा लिया... दरअसल पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहया खान ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जनभावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया था... इसके बाद शेख मुजीद गिरफ्तार कर लिए गए... पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आने लगे... पाकिस्तान की नापाक हरकतें बढ़ती जा रही थीं... 3 दिसंबर 1971 को इंदिरा कोलकाता में एक जनसभा कर रहीं थी... उसी दिन शाम को पाकिस्तानी वायु सेना के विमानों ने भारतीय वायु सीमा पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बमबारी कर दी... इंदिरा ने ठान लिया कि पाकिस्तान को सबक सिखाना है... भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया.... 13 दिन में लड़ाई खत्म हो गई. 16 दिसंबर को हमारी सेना ने पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को बंदी बना लिया... इंदिरा ने पाकिस्तान का इतिहास ही नहीं, भूगोल भी बदल दिया.... पूर्वी पाकिस्तान आजाद हो गया... इंदिरा की पहल पर बांग्लादेश नाम से नया देश बना... जिसके राष्ट्रपति बने शेख मुजिबिल रहमान. उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा का अवतार तक कहा था... उस समय भारत के लिए पूर्वी पाकिस्तान पर आक्रमण करना कोई आसान काम नहीं था... अमेरिका और चीन की तरफ से भी भारत पर दबाव बनाया जा रहा था... लेकिन इंदिरा उस समय आत्मविश्वास से लबरेज थीं... उन्होंने एक कार्यक्रम में बीबीसी से कहा था, ‘हमलोग इस बात पर निर्भर नहीं है कि दूसरे क्या सोचते हैं. हमें यह पता हैं कि हम क्या करना चाहते हैं और हम क्या करने जा रहे हैं. चाहे उसकी कीमत कुछ भी हो...

युद्ध की पृष्‍ठभूमि साल 1971 की शुरुआत से ही बनने लगी थी... पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ां ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को जब सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया... दरअसल जब पूर्वी पाकिस्तान में लोकप्रिय नेता शेख मुजीबुर रहमान को सत्ता सौंपने की जनता की भारी मांग को पाकिस्तान मानने से इंकार कर दिया था... बंग बंधु के नाम से लोकप्रिय शेख मुजीबुर रहमान को पूर्वी पाकिस्तान स्टेट इलेक्शन में 169 में से 167 सीटें हासिल हुई थीं और उन्हें पाकिस्तान संसद के निचले सदन में भी बहुमत मिल गया था. इस बहुमत का मतलब था कि उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया जाए.. लेकिन पाकिस्तान के सैनिक शासक जनरल याहिया खान ने सेना को ढाका में आवामी लीग के खिलाफ हमला बोलने का आदेश दे दिया और मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर पश्चिमी पाकिस्तान ले जाया गया... मुजीबुर रहमान के गिरफ्तारी के बाद जनरल याहिया खान ने पूर्वी पाकिस्तान में अशांति को दूर करने के लिए जनरल टिक्का खान को वहां भेजा... इस बर्बर जनरल के नेतृत्व में जनता पर कभी न खत्म होने वाले जुल्म ढाए जाने लगे..... लाखों निर्दोष लोगों को मौत के घाट पहुंचा दिया गया जिसके बाद एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए भारत में आकर शरण ली... पूर्वी पाकिस्तान में हालात को देखते हुए 27 मार्च 1971 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आगे आकर पूर्वी पाकिस्तान की स्वतंत्रता का समर्थन किया.. और भारत की सीमा.. पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों के लिए खोल दिया... उधर पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने खुद को जनरल टिक्का खान के दमनकारी शासन से मुक्ति पाने के लिए 'मुक्ति वाहिनी' जनसेना का निर्माण कर लिया.. जिसने पाकिस्तानी सेना को काफी नुकसान पहुंचाया.. भारत ने हथियारों के माध्यम से मुक्ति वाहिनी को खुलकर समर्थन देना शुरू कर दिया.. तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चाहती थीं कि पाकिस्तान पर अप्रैल में आक्रमण किया जाए. इस बारे में इंदिरा गांधी ने थलसेनाध्‍यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय ली... तब मानसून भी दस्‍तक देने ही वाला था. ऐसे समय में पूर्वी पाकिस्तान पर हमला करना मुसीबत मोल लेने जैसा था... 3 दिसंबर, 1971 को इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित करने पहुंची थीं... तभी उन्हें पाकिस्तान द्वारा हमले की सूचना मिली.. हमले की खबर मिलते ही दिल्ली लौटकर इंदिरा गांधी सीधे मैप रूम पहुंची, जहां उन्हें हालात का ब्यौरा दिया गया. उस वक्त रात के 11 बज चुके थे. सेना के अफसरों से बैठक के बाद इंदिरा गांधी ने कैबिनेट बैठक बुलाई और फिर विपक्ष के नेताओं से मुलाकात कर उन्हें भी पूरे हालात की जानकारी दी... आधी रात हो चुकी थी जब इंदिरा ने ऑल इंडिया रेडियो के जरिए पूरे देश को संबोधित किया... इंदिरा ने भारतीय सेना को ढाका की तरफ बढ़ने का हुक्म दे दिया. वहीं भारतीय वायुसेना ने पश्चिमी पाकिस्तान के अहम ठिकानों और हवाई अड्डों पर बम बरसाने शुरू कर दिये... इस दौरान भारत की तीनों सेनाओं ने पाकिस्तान की जबरदस्त नाकेबंदी की थी....

साल 1971 में भारत के पूरब में बसा पाकिस्तान का वो हिस्सा जिसे अब बांग्लादेश कहा जाता है, वहां ऐसा कुछ हो रहा था जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा था... भारत की प्रधानमंत्री होने के नाते इंदिरा पर इस बात का दबाव बढ़ रहा था कि वो जल्द से जल्द इस मसले का हल निकालें और जरूरी कार्रवाई करें. इसीलिए इंदिरा गांधी ने एक तरफ भारतीय फौज को युद्ध की तैयारी करने का आदेश दे दिया और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोशिश शुरू कर दी.. पूर्वी पाकिस्तान की समस्या को पाकिस्तान अपना अंदरूनी मामला बता रहा था लेकिन इंदिरा ने साफ कर दिया पूर्वी पाकिस्तान में जो हो रहा है वो पाकिस्तान का अंदरूनी मामला नहीं है क्योंकि उसकी वजह से भारत के कई राज्यों में शांति भंग हो रही थी... प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक तरफ पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक घेराबंदी कर रही थीं और दूसरी तरफ दुनिया भर में भारत के पक्ष में समर्थन जुटा रही थीं. उधर पाकिस्तान चीन और अमेरिका के दम पर लगातार भारत को उकसा रहा था... पाकिस्तान को उस वक्त ये अंदाजा भी नहीं था कि भारतीय सेना पहले ही अपनी तैयारी शुरू कर चुकी है... सवाल ये था कि पहला हमला कौन करेगा... पाकिस्तान भारत की तैयारी का अंदाजा नहीं लगा पाया 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी विमानों ने भारत के कुछ शहरों पर बमबारी करने की गलती कर दी... 3 दिसंबर के हमले का जवाब भारत ने आपरेशन ट्राइडेंट शुरु करके दिया था... चार दिसंबर, 1971 को आपरेशन ट्राइडेंट शुरू हुआ.. 5 दिसंबर को भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर जबरदस्त बमबारी कर पाकिस्तानी नौ सैनिक मुख्यालय को तबाह कर दिया... पाकिस्तान पूरी तरह घिर चुका था... अब पाकिस्तानी नौसेना की कमर टूट चुकी थी.. उधर अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद के लिए अपनी नौसेना का सबसे शक्तिशाली सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की तरफ भेज दिया जिसके जवाब में इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ के साथ हुई संधि के तहत उन्हें अपने जंगी जहाजों को हिंद महासागर में भेजने के लिए कहा. इस तरह से दो महाशक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल हो चुकी थीं.. अमेरिकी बेड़े के आने पर युद्ध की दिशा बदल सकती थी, पर अमेरिकी बेड़े के पहुंचने के पहले ही भारतीय सेनाओं ने युद्ध को ही निर्णायक मोड़ दे दिया.. पाकिस्तान की पनडुब्बी 'गाजी' को विशाखापट्टनम नौसैनिक अड्डे के पास डुबो दिया गया.. भारतीय नौसेना का पराक्रम चरम पर था.. इतिहास में पहली बार किसी नौसेना ने दुश्मन की नौसेना को एक सप्ताह के अंदर पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया था.... 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं... भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं. बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी. इस हमले ने युद्ध के रूख को एकदम स मोड़ दिया.. और पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया......

15 दिसंबर को पाकिस्तानी सेनापति जनरल एके नियाजी ने युद्धविराम की प्रार्थना की.. 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी फौजों ने आत्मसमर्पण कर दिया.. 16 दिसंबर की सुबह लेफ्टिनेंट जनरल जैकब को मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें। जैकब की हालत बिगड़ रही थी... नियाज़ी के पास ढाका में 26400 सैनिक थे, जबकि भारत के पास सिर्फ़ 3000 सैनिक और वे भी ढाका से 30 किलोमीटर दूर.. लेकिन भारतीय सेना ने युद्ध पर पूरी तरह से अपनी पकड़ बना ली थी.. लेफ्टिनेंट जनरल जगत सिंह अरोड़ा अपने दलबल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द ख़त्म होने वाला था.. जैकब के हाथ में कुछ भी नहीं था.. जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था.. शाम के साढ़े चार बजे लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे.. आत्म-समर्पण का दस्तावेज़ एक मेज़ पर रखा हुआ था.. अरोड़ा और नियाज़ी मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म-समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए। नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाज़ी की आंखों में आंसू थे.. अंधेरा घिरने के बाद स्‍थानीय लोग नियाज़ी की हत्‍या पर उतारू नजर आ रहे थे... भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी के चारों तरफ़ एक सुरक्षित घेरा बना दिया... बाद में नियाजी को बाहर निकाला गया... उधर दिल्ली में इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ़्तर में एक टीवी इंटरव्यू दे रही थीं. तभी जनरल मानेक शॉ ने उन्‍हें बांग्लादेश में मिली शानदार जीत की ख़बर दी... इंदिरा गांधी ने लोकसभा में शोर-शराबे के बीच घोषणा की कि युद्ध में भारत को विजय मिली है... इंदिरा गांधी के बयान के बाद पूरा सदन जश्‍न में डूब गया... कुल 13 दिन तक चले युद्ध के बाद आखिरकार भारत के जांबाज सैनिकों के आगे पाकिस्तानियों को धूल चाटनी पड़ी और उन्होंने बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण का प्रस्ताव रखा... भारत ने अश्वासन दिया कि उन्हें सुरक्षित पूर्वी पाकिस्तान से उनके देश पाकिस्तान भेजा जाएगा... आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर 16 दिसंबर को ढाका में पाकिस्तान के लेफ्ट‍िनेंट जनरल एएके नियाजी और भारतीय सेना के पूर्वी आर्मी कमांडर लेफ्ट‍िनेंट जनरल जे अरोड़ा ने दस्तखत किए... मुक्ति वाहिनी ने ढाका पर नियंत्रण हासिल किया और बांग्लादेश का निर्माण हुआ....

ये किस्सा एक जंग का है.. ये किस्सा बहादुरी का है... ये किस्सा है एक विकासशील देश के ऐसी कुटनीति का जिसने महाशक्ति अमेरीका को उसके ही खेल में उलझा दिया था.. ये कहनी एक ऐसी फौज की है जो असल्हे से भले कमजोर रही हो पर उसके हौसले फौलाद थी.... ये किस्सा हिन्दुस्तान की फतह का है और पाकिस्तान के शिकस्त का और आत्मसमर्पण का.
हजारों किलोमाटर का फासला लेकिन देश एक.. 24 साल से दूर की कौड़ी बना पूर्वी पाकिस्तान 1971 में अपनी नई नायति से मुलाकात करने जा रहा था.. और उसके साथ शुरू हो रहा था वो किस्सा जो दुनिया के नक्से को बदलने का किस्सा है..
ये वो दौर था, जब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान की सेना ने आम लोगों की जिंदगी जहन्नुम बना दी थी... रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तानी फौज ने दो लाख महिलाओं से बलात्कार किया.. और लाखों बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया था.. इस कार्रवाई को पाकिस्तानी सेना ने आपरेशन सर्च लाइट का नाम दिया.
पाकिस्तान की सिविल-मिलिट्री नौकरशाही ने जिसमें अब राजनीतिक लोग भी शामिल हो गए थे सब ने मिलकर मुजीबुर्रहमान को इजाजत नहीं दी की वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने... खास बात ये थी कि सेना के इस फैसले के साथ जुल्फीकार अली भुट्टो भी थे... लिहाजा, पूर्वी पाकिस्तान में इसका जमकर विद्रोह शुरु हो गया...
पाकिस्तान ने यही सबसे बड़ी गलती कर बैठा की उसने चुनाव के नतीजों को मानने से इंकार कर दिया... अगर पाकिस्तान उस वक्त चुनाव का फैसला मान लेता तो उसके टुकड़े नहीं होते...
ये वो दास्तान है जिसकी इबारत लिखनी की ताकत किसी स्याही में नहीं थी.. ये दास्तान जाबांजो के हौसले और उनके लहू से लिखी गई है.. वो दास्तान जो हमेशा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो पर चस्पा हो गया है...
1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में उन्होंने ही पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण की शर्तें सुनाई... जिसमें ये शर्त थी कि पाकिस्तानी सेना न सिर्फ भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करेगी बल्कि बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी के सामने भी आत्मसमर्पण होगा... पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी के पास अकेले ढाका में 26 हजार 400 सैनिक थे... लेकिन उन्हें सिर्फ 3000 भारतीय सैनिकों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा... इसी जंग के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ जो उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था. इस युद्ध में भारत के सामने पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए और करीब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए थे.
यह युद्ध भारत के लिए ऐतिहासिक और हर देशवासी के दिल में उमंग पैदा करने वाला साबित हुआ... देश भर में 16 दिसम्बर को 'विजय दिवस' के रूप में मनाया जाता है. वर्ष 1971 के युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे, जबकि 9,851 घायल हो गए थे.

16 दिसंबर 1971.. ये वो दिन है जब हमारे देश के जांबाज सैनिकों को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भारी जीत मिली थी... इस विजय के बाद पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए थे और विश्व के नक्शे पर बांग्लादेश नामक एक नए राष्ट्र का उदय हुआ था... इसी दिन पूर्वी पाकिस्तान में 92,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था... भारत-पाक युद्ध की शुरुआत तब हुई, जब 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तानी वायु सेना ने भारत पर हमले शुरू कर दिए...  

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

मैं मीडिया

नई सोच है..सच्चाई है.. इरादों में जान है
खबरों का तलबगार... लोकतंत्र का चौंथा खंभा हैं..
कहीं बांटते हैं खुशियां कहीं बांटते हैं हम गम
जातपात की चारदीवारी रोज यहां गिराते हैं
गेंद सा हाथों में तेरे विश्व को दिखलाता हूं
बेखबर होकर खबरों में जीता हूं
कभी कड़्वा, कभी कसैला.. कभी तीखा-कभी विषैला
कहीं फेंका गया तेज़ाब.. कहीं लूटा गया हिजाब
कहीं दहेज़ की आग में जल गयी सुहागिन
कहीं कचरे के ढेर में नवजात मिल रही है
फसल हुयी तबाह है.. मानसून है राह भटक रहा
कर्ज के नीचे दबा हुआ.. फांसी पर किसान लटक रहा
रुपया गिरा मजबूत है डॉलर.. खेल के मैदान से
कर्सी पर बैठने वालो को जमी की अहमियत याद दिलाते हैं
जोड़ता हूं समाज को जो बंट जाते हैं राजनीति के अखाड़ो में
एक बेहतर कल लिए मजहब से पहले देश को याद रखता हूं
मैं प्रबल मैं प्रखर..
नई सोच है..सच्चाई है.. इरादों में जान है

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

मां तेरा बेटा पत्रकार है

   

तू जानती है न मां तेरा बेटा पत्रकार है
तेरी सीख से हर घर मेरा परिवार है
दिवाली है तुझे खुश दिखना होगा
शुभ लाभ तुझे खुद लिखना होगा
तु मुझे बेतहाशा याद करती होगी
मैं जहां रहूं मेरे साथ तेरा प्यार है
तू समझती है न मां तेरा बेटा पत्रकार है
तेरे बेटे के कलम की दिवाली सबकी होगी
लोगों की खुशी में खुशी मेरा व्यवहार है
तू जानती है न मां तेरा बेटा पत्रकार है