मंगलवार, 15 मार्च 2022

बिल और मिलिंडा गेट्स की प्रेम कहानी

 

हेलो दोस्तो आज वैलेंटाइन डे है और आज हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसी खूबसूरत लवस्टोरी की जिसकी दी एंड तो हो गई लेकिन उस प्रेम कहानी की स्टोरी अभी खत्म नहीं हुई है और ना ही उन दोनों को बीच का लव... यानी की मुहब्बत... जी हां आप शायद अब तक समझ गये होंगे कि आखिर हम बात किस प्रेम कहानी की कर रहे हैं.. कहानी ठीक आज से 35 साल पहले यानी की साल 1987 से शुरू होती है... इस प्रेम कहानी को जानने के लिये आईये कुछ फ्लैशबैक में चलते हैं। बात 1975 की है जब ज्‍यादातर अमरीकी लोग टाइपराइटर का इस्‍तेमाल किया करते थे,.. उन्ही दिनों अमेरिका का एक युवक ने अपने दोस्‍त पॉल एलन के साथ मिलकर एक कंपनी शुरू की, जो कंप्‍यूटर सॉफ्टवेअर बनाने का काम करती थी... युवक की उम्र उस वक्‍त 20 साल थी. एक छोटे से गैराज से शुरू हुई मामूली सी कंपनी 12 साल बाद 1987 तक आते-आते इतनी बड़ी हो चुकी थी कि यूनिवर्सिटी-कॉलेजों से कंप्‍यूटर और सॉफ्टवेअर की नई-नई पढ़ाई करके निकल रहे युवाओं को अपने यहां नौकरियां दे रही थी... ऐसे ही कॉलेज से पढ़कर निकली एक 23 साल की लड़की ने 1987 में माइक्रोसॉफ्ट जॉइन किया... उस लड़की का नाम था मिलिंडा फ्रेंच. मिलिंडा जवान थी.. खूबसूरत थी.. उम्‍मीदों और सपनों से भरी थी... वहीं दूसरी तरफ मिलिंडा से उम्र में 9 साल बड़े 32 साल के बिल गेट्स के पास जिंदगी में कंप्‍यूटर और सॉफ्ट वेअर के अलावा और कुछ नहीं था... सोने और जिंदगी के बाकी बुनियादी जरूरी काम करने के अलावा बिल का सारा समय सिर्फ कंप्‍यूटरों के साथ बीतता था. उस समय में प्‍यार और डेटिंग जैसी चीजों के लिए कोई जगह नहीं थी. जबकि मिलिंडा की जिंदगी प्‍यार से लबालब थी... बिल की कंपनी में मिलिंडा काम तो करती थी लेकिन दोनों की मुलाकात इससे पहले कभी नहीं हुई थी.. एक दिन एक ट्रेड फेयर के दौरान डिनर टेबल पर दोनों आमने-सामने थे. दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्‍कुराए. पूरी शाम बातें करते रहे. बिल को मिलिंडा और मिलिंडा को बिल अच्‍छे लगे. मिलिंडा सोच भी नहीं सकती थी कि जिस कंपनी में वो काम करती हैं, उसी के बॉस को डेट करेंगी. लेकिन मिलिंडा पर बिल का दिल आ गया था. कठोर, गणित के सवालों और कंप्‍यूटर की तर्ज पर काम करने वाले बिल का दिमाग अब थोड़ा प्‍यार-मुहब्‍बत के इलाकों में भी ताकाझांकी करने लगा था... बिल और मिलिंडा को डेट करते एक साल हो चुका था. वो अकसर बाहर खाने पर मिलते, एक-दूसरे के घर जाते और फोन पर लंबी-लंबी बातें किया करते थे. आश्‍चर्य नहीं कि दोनों की बातचीत का एक बड़ा हिस्‍सा भी कंप्‍यूटरों और सॉफ्टवेअरों के बारे में ही होता था... लेकिन इस रिश्‍ते का एक पहलू ये भी था कि शुरू-शुरू में ये रिश्‍ता दोनों के लिए ही पहली प्रिऑरिटी नहीं था. दोनों डेट तो कर रहे थे, लेकिन पैरलली उनकी दो अलग-अलग दुनिया भी थी. बिल कहते हैं, “मिलिंडा के और भी बॉयफ्रेंड थे और मेरे पास माइक्रोसॉफ्ट था... एक साल तक डेट करने के बाद बिल को लगने लगा था कि अब रिश्‍ते का कोई स्‍थाई ठिकाना होना चाहिए.. उधर मिलिंडा भी एक कामकाजी, औऱ आत्‍मनिर्भर महिला थीं.. बिल को ये बात पसंद भी थी.. फिर जब दोनो लोग एक दूसरे को पसंद कर रहे थे तो फिर क्या था आखिर वो दिन आ ही गया.. 1 जनवरी 1994 को बिल और मिलिंडा ने एक छोटे से आइलैंड पर जाकर शादी कर ली. जाहिर है बिल गेट्स की लिस्‍ट में मिलिंडा के साथ शादी की अच्‍छाइयों की फेहरिस्‍त बुराइयों से ज्‍यादा बड़ी थी. वो जीत गई. दोनों ने बाकी जिंदगी साथ बिताने का फैसला कर लिया. आज उनके तीन बच्‍चे हैं. पहले तो कुछ समय तक मिलिंडा ने सारा समय शादी और परिवार को ही समर्पित कर रखा था. फिर बच्‍चों के बड़े होने के बाद वो काम पा लौट आईं और दोनों ने मिलकर बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की शुरुआत की... दोनों ने 27 साल बहुत खुशहाल जिंदगी गुजारी, लेकिन 27 साल की शादी और 34 साल की कोर्टशिप के बाद पिछले साल अगस्‍त, 2021 को दोनों अलग हो गए. पूरी दुनिया के मीडिया में दोनों की शादी इतनी सुर्खियों में नहीं रही थी, जितना ही दोनों का तलाक रहा क्‍योंकि 27 साल बाद दोनों दुनिया के सबसे अमीर और ताकतवर व्‍यक्तियों में से एक थे... लेकिन जितनी गरिमा, स्‍नेह और जिम्‍मेदारी के साथ दोनों अलग हुए, उसे देखकर लगता है कि उनका साथ इससे कहीं ज्‍यादा स्‍नेह और जिम्‍मेदारी के बोध से भरा हुआ था... आज किसी को भी नही लगता कि जिसका तलाक हो गया हो, उसकी प्रेम कहानी भी इतनी कीमती हो सकती है बिल और मिलिंडा आज पति-पत्‍नी की तरह साथ नहीं हैं, लेकिन एक दोस्‍त, सहयोगी और अपने बच्‍चों के माता-पिता की तरह वो आज भी साथ हैं और हमेशा रहेंगे.

भारत के 31 मोस्ट वांटेड आतंकवादी देखिए किस-किस का है नाम है

 

इन दिनों दुनिया भर में आतंकवाद एक अहम मुद्दा बना हुआ है... भारत भी सालों से आतंकवाद  से लड़ रहा है... कई आतंकी ऐसे हैं, जो भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं. ऐसे में भारत सरकार ने UAPA के जरिए कई संगठनों और व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित भी किया है... लेकिन, क्या आप जानते हैं भारत के लिए कौन-कौन से व्यक्ति मोस्ट वांटेड हैं और वो किस संगठन से जुड़े हुए हैं... अगर आप जानना चाहते हैं कि भारत सरकार की ओर से कौन-कौन से वो आतंकी है जो मोस्ट वांटेड घोषित किया है... तो आप इस वीडियो को अंत तक देखिएगा.. हम चून-चून कर एक-एक आतंकवादी का चेहरा आपके सामने बेनकाब करने वाले हैं.. अब तक गृह मंत्रालय ने UAPA के अधीन 31 व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित किया है. तो जानते हैं इस लिस्ट में किस-किस का नाम शामिल है… आपको जानकर हैरानी होगी कि गृहमंत्रालय ने जो संसद में रिपोर्ट पेश किये है उसमे सबसे पहले पायदान पर मौलाना मसूद अजहर का नाम है मौलाना मसूद अजहर को दिसम्बर 1999 में कंधार ‌विमान हाईजैक मामले का मुख्य मास्टरमाइंड माना जाता है। इसे 2001 में पार्लियामेंट अटैक का दोषी भी माना जाता है।

वहीं दूसरे नंबर पर पाकिस्तान के ही हाफिज मुहम्मद सईद का नाम है हाफिज मुहम्मद सईद लश्कर ए तैयबा और जमात उद दावा का मुखिया है.. हालांकि वह चैरिटी करने का दावा करता रहा है लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे आतंकी घोषित कर दिया है। सईद को संसद भवन और मुंबई में आतंकी हमले का दोषी माना जाता है.. गृहमंत्रालय की लिस्ट में तीसरे पायदान पर जकी-उर-रहमान लखवी का नाम है.. मुंबई में 2008 को हुए आतंकी हमले के मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर है जकी उर रहमान लखवी.. लखवी आतंकवादी गतिविधियों के लिए फंडिंग करता है और लश्कर ए तैयबा का टॉप कमांडर है और इसे हाफिज सईद के बाद आतंकी संगठन में नंबर दो माना जाता है. चौथे नंबर पर दाऊद इब्राहिम कास्कर का नाम है.. दाऊद इब्राहिम देश का सबसे बड़ा मोस्ट वांटेड अपराधी है.. वह अपने भाई अनीस और राइट हैंड छोटा शकील के जरिए गैंग चलाता है.. उसे 1993 मुंबई सीरियल बलास्ट का आरोपी माना जाता है.. 2008 में हुए धमाके में भी उसका नाम सामने आया है.. भारतीय अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित कर रखा है.. पांचवे पैदान पर वाधवा सिंह बब्बर का नाम है.. वाधवा सिंह बब्बर पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन 'बब्बर खालसा इंटरनैशनल' का नेता है.. गृह मंत्रालय की लिस्ट में छठे पोजिशन पर लखबीर सिंह का नाम है लखबीर सिंह...... लखबीर सिंह भी पाकिस्तान स्थित प्रमुख आतंकवादी संगठन 'इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन' का चीफ है और वह पाकिस्तान में ही आईएसआई के संरक्षण में अपना ऑपरेशन चलता है.. सातवे नंबर पर रणजीत सिंह का नाम है.. रणजीत सिंह पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन 'खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स' का प्रमुख नेता.. गृहमंत्रालय की लिस्ट में आठवा नाम परमजीत सिंह का है.. परमजीत सिंह पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन खालिस्तान कमांडो फोर्स का प्रमुख है.... जबकी नवे नंबर पर भूपिंदर सिंह भिंडा का नाम है भूपिंदर सिंह भिंडा जर्मनी के आतंकवादी संगठन 'खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स' का प्रमुख सदस्य हैं और वो हमेशा सक्रिय रहता है... दसवें स्थान पर गुरमीत सिंह बग्गा का नाम है... गुरमीत सिंह बग्गा भी भूपिंदर सिंह भिंडा के साथ जर्मनी स्थित आतंकवादी संगठन खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स का प्रमुख सदस्य है... ग्यारहवे स्थान पर गुरपतवंत सिंह पन्नू का नाम है.. गुरपतवंत सिंह पन्नून भी अमेरिका के गैरकानूनी असोसिएशन 'सिख फॉर जस्टिस' का प्रमुख सदस्य है.. बारहवें नंबर पर हरदीप सिंह निज्जर का नाम है निज्जर कनाडा में खालिस्तान टाइगर फोर्स का प्रमुख है... तेरहवें स्थान पर परमजीत सिंह का नाम है रिपोर्ट के मुताबिक परमजीत सिंह ब्रिटेन में 'बब्बर खालसा इंटरनैशनल' का चीफ हैं.. चौदहवे नंबर पर साजिद मीर का नाम है साजिद मीर लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर है.. यह भी मुंबई में 26/11 हमले का मास्टरमाइंड कहा जाता है.. पंद्रहवे पायदान पर यूसुफ मुजम्मिल है.. यूसुफ मुजम्मिल 26/11 मुंबई हमले का आरोपी और आतंकी संगठन लश्कर का आतंकी है.. सोलहवे नंबर पर अब्दुर रहमान मक्की का नाम है अब्दुर रहमान मक्की लश्कर चीफ हाफिज सईद का बहनोई है.. सतरहवें नंबर पर शाहिद महमूद का नाम है.. अठारहवें नंबर पर फरहतुल्ला गोरी का नाम है जबकी उन्नीसवें स्थान पर अब्दुल रऊफ असगर का नाम है... पाकिस्तान के इब्राहिम अतहर का नाम 20 वें नंबर पर है जबकि 21 वे नंबर पर यूसुफ अजहर का नाम है... शाहिद लतीफ 22 वे स्थान पर है जबकी 23 वें नंबर पर सैयद मोहम्मद यूसुफ शाह का नाम है.. गुलाम नबी खान 24 वें नंबर पर है वहीं जफ्फर हुसैन भट 25 वें नंबर पर… रियाज इस्माइल शाहबंदर आतंकवादियों की सूची में 26 वे स्थान पर है जबकी पकिस्तान का ही रहने वाला वोस्ट वांटेड आतंकी मो. इक़बाल 27 नंबर पर है... मोस्ट वांटेड आतंकियों कि सूची में 28 वें नंबर पर शेख शकील उर्फ ​​छोटा शकील का नाम है छोटा शकील अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का सबसे खास या यूं कहें दाऊद का राइट हैंड है... 29 वें स्थान पर मोहम्मद अनीस शेख का नाम है.. मोहम्मद अनीस शेख भी अंडरवर्ल्ड के लिए काम करता है और भारत में आतंकियों को भड़काने का काम करता है... 30 वें पायदान पर इब्राहिम मेमन है.. इब्राहिम मेमन.. टाइगर मेमन के नाम से मशहूर है और 1993 मुंबई धमाकों के मुख्य साजिशकर्ता है.. गृह मंत्रालय ने UAPA के अधीन जिन आतंकवादियों के नाम की घोषणा की उसमें जावेद चिकना का भी नाम है जावेद चिकना भी दाऊद इब्राहिम का करीबी माना जाता है.. जावेद चिकना इन दिनों अफ्रीका के देशों में अपनी जड़े जमा लिया है। वो ISI के लिए फंडिंग का काम भी करता है.. और उनके निशाने पर अफ्रीका में रहने वाले भारतीय मूल के कामगार होते हैं.. गृहमंत्रालय के लिस्ट में हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और अल बदर जैसे आतंकी संगठनों के प्रमुख आतंकियों को शामिल किया गया है. जो जम्मू-कश्‍मीर के अलग-अलग हिस्सों से लेकर पूरे भारत में आतंक फैला रहे हैं... कुल मिलाकर गृह मंत्री के काम करने का तरीका भी इसी ओर इशारा कर रहा है... आने वाले दिनों में सुरक्षा बल आतंकियों के खिलाफ और अधिक सख्त कदम उठा सकते हैं.

मिसाइल, टैंक के बाद अब बायोलॉजिकल वेपन की बारी!

 रूस और युक्रेन के बीच महायुद्ध में अब तक मिसाइल, टैंक और हवाई हमलों की तस्वीर सबने देखी लेकिन अब केमिकल वॉर की आहट होने लगी है। अमेरिका ने दावा किया है कि रूस, यूक्रेन पर केमिकल या जैविक हथियारों से अटैक कर सकता है। लेकिन रूस ने पलटवार करते हुए ये दावा किया है कि उसने यूक्रेन में जैविक हथियारों को खोज निकाला है जो अमेरिका की मदद से यूक्रेन में बनाए जा रहे है। मॉस्को के दावे पर हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक हुई। इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के प्रतिनिधि ने कहा कि यूक्रेन के पास ना कोई बायोलॉजिकल वेपन प्रोग्राम है और ना ही यूक्रेन में अमेरिका के समर्थन से चलने वाली कोई बायोलॉजिकल लैब्स हैं। अरोप सच्चे हैं या झूठे इसकी पड़ताल की जरूरत है। ऐसे में आज ये समझना जरूरी हो जाता है कि जैविक हथियार क्या होता है और इसका हमला कितना खतरनाक होता है। साथ में हम यह भी जानेंगे कि क्या सच में यूक्रेन के पास जैविक हथियार हैं और अगर हैं तो वह क्या रूस के खिलाफ उनका प्रयोग करेगा। 'Biological War' ये शब्द आज आपको नया लग रहा होगा, लेकिन इसका इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। सबसे पहले समझिए कि जैविक हथियार क्या होते हैं? 

आसान भाषा में कहा जाए तो ऐसे हथियार जिनमें विस्फोटक नहीं बल्कि कई तरह के वायरस, बैक्टीरिया, फंगस और ज़हरीले पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है उसे जैविक हथियार कहा जाता है। जैविक हमले से लोग गंभीर रूप से बीमार होने लगते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है। इसके अलावा शरीर पर इस हमले के बहुत भयानक असर होते हैं। कई मामलों में लोग विकलांग और मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। जैविक हथियार कम समय में बहुत बड़े क्षेत्र में तबाही मचा सकते हैं। चीन का कोरोना वायरस इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है। चीन पर यह आरोप हैं कि उसने वुहान लैब से कोरोना के वायरस फैलाए जिससे चीन को छोड़ कर दुनियाभर में लाखों लोगों की मौत हुई और अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई। जिसका फायदा चीन को मिला है। इसके अलावा चूहों से होने वाली बीमारी प्लेग जैविक हमले का दूसरा उदाहरण है। ऐसा माना जाता है कि जर्मनी, अमेरिका, रूस और चीन समेत दुनिया के 17 देश जैविक हथियार बना चुके हैं, लेकिन अभी तक किसी ने इस बात को नहीं माना है कि उनके पास जैविक हथियार हैं। साधारण शब्दों में कहें तो रासायनिक हथियार एक ऐसा रसायन होता है जिसका उपयोग सोच समझ कर दुश्मन के उपर मौत या नुकसान पहुंचाने के लिये किया जाता है।

जैविक हथियारों का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। पुराने ज़माने में युद्ध के दौरान दुश्मन के इलाके के तालाबों और कुओं में ज़हर मिलाने की घटना आपने सुनी होंगी। लेकिन पहली बार जैविक हमले की बात छठी शताब्दी से आती है जब मेसोपोटामिया के असीरियाई साम्राज्य के सैनिकों ने दुश्मन इलाके के कुओं में एक ज़हरीला फंगस डाल दिया था, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। यूरोपीय इतिहास में तुर्की और मंगोल साम्राज्य ने जैविक हथियारों का इस्तेमाल किया था। इसके लिए 1347 में मंगोलियाई सेना ने बीमार जानवरों को दुश्मन इलाके में तालाब और कुओं में फिकवा दिया था जिससे प्लेग महामारी फैल गई थी। इसे इतिहास में ब्लैक डेथ के नाम से जाना जाता है। इससे 4 साल के अंदर यूरोप में ढाई करोड़ लोगों की मौत हुई थी। पहले विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने पहली बार जैविक हथियारों का इस्तेमाल किया था। इस हमले के लिए जर्मनी ने एंथ्रेक्स और ग्लैंडर्स बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया था। इसके बाद 1939 से 1945 के दौरान दूसरे विश्वयुद्ध में जापान ने चीन के खिलाफ जैविक हथियारों का इस्तेमाल किया था। साल 2001 में अमेरिका में कुछ आतंकवादियों ने एंथ्रेक्स बैक्टीरिया से संक्रमित चिट्ठी, अमेरिकी कांग्रेस के कार्यालय में भेंजी थी, जिससे पांच लोगों की मौत हो गई थी।

जैविक हथियारों के भयावहता को लेकर सबसे पहले 1925 में जिनेवा प्रोटोकॉल के तहत कई देशों ने इन हथियारों के नियंत्रण के लिए बातचीत शुरू की, इसके बाद 1972 में  BWC यानी बायोलॉजिकल वेपन कन्वेंशन की स्थापना की गई। 26 मार्च 1975 को 22 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए। आज करीब 183 देश इसके सदस्य देश हैं, जिसमें भारत भी शामिल है। हालांकि, देखा जाए तो जैविक हथियारों के उपयोग न करने की कसम खाने वाले देश आज भी इस तरह के हथियारों के निर्माण में लगे हुए हैं।

फिलहाल अमेरिका ने जिस रूसी दावे को खारिज किया है उसे समझना शायद ज़्यादा ज़रूरी है। रूस की तरफ से ये दावा किया जा रहा है कि कैमिकल वैपन यानी जैविक हथियार यूक्रेन में मौजूद 30 से ज़्यादा खुफिया लैब में तैयार किए जा रहे हैं। और उन लैब के लिए पैसा अमेरिका दे रहा है। रूस ने अपने दावे के बाद इस बात पर जौर दिया कि कैमिकल वैपन के तमाम अड्डों को फौरन तबाह कर देना चाहिए। अमेरिका और रूस के बीच ज़हरीली तू-तू मैं-मै के बीच आशंका गहराने लगी है कि सही में कैमिकल वैपन का इस्तेमाल न शुरू हो जाए। खबरों के मुताबिक गनीमत है कि अभी बात तू-तू मैं-मै के स्तर पर ही अटकी हुई है। लेकिन अगर कहीं बात हद से आगे बढ़ गई और कहीं से भी तरकश के वो ज़हरीले तीर चल गए तो जो तबाही का आलम होगा उसे शब्दों से कहना नामुमकिन हो जाएगा। और तब इंसानों की बनाई इस दुनिया को अफ़सोस मनाने का भी वक़्त नहीं मिलेगा।

फिलहाल तो इस प्रकरण को लेकर हम यही कह सकते हैं कि पर्दे पर तो रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है। लेकिन असल में पर्दे के पीछे से ये जंग रूस और अमेरिका के बीच छिड़ी हुई है। इससे पहले यूक्रेन के आसमान से मौत के बरसने का सिलसिला थमे, अमेरिका ने एक और पलीता लगाकर इस युद्ध को फिर हॉट कर दिया है। अबकी बार जुबान से निकला है जैविक हथियार। 

थ्री कैपिटल प्लान। जानिए विवाद के पीछे की पूरी कहानी?

 राजधानी बदलने का किस्‍सा आंध्र प्रदेश में बहुत पुराना हैं। इतिहास गवाह है आंध्र प्रदेश को सीमाएं बदलने के साथ ही हर बार इस प्रदेश को राजधानी के लिए समझौता करना पड़ा है। सबसे पहले साल 1953 में मद्रास से अलग कर एक नया राज्‍य बना दिया गया। जिसका नाम दिया गया आंध्र प्रदेश। तब राजधानी मद्रास, तमिलनाडु में चला गया था। फिर आंध्रप्रदेश को नयी राजधानी बनानी पड़ी थी। 1956 में आंध्र प्रदेश गठित होने के साथ ही करनूल, हैदराबाद में मिल गया जिससे एक बार फिर प्रदेश को राजधानी के रूप में करनूल खोना पड़ा। इसी तरह 2014 में तेलंगाना के अलग राज्य बनने पर हैदराबाद तेलंगाना की सीमा में आ गया। अमरावती को राज्य की राजधानी बनाए जाने की दिशा में काम होना था जिसके लिए 33 हजार करोड़ रुपये का बजट तय हुआ। लेकिन प्रदेश में टीडीपी के बजाय वाईएसआर की सरकार बन गयी और अमरावती को राजधानी बनाने का फैसला खटाई में पड़ गया।

हाल ही में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य की तीन राजधानी बनाने संबंधी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी सरकार की योजना को झटका देते हुए आदेश दिया है कि अमरावती मास्टर प्लान को लागू किया जाए और क्षेत्र में सभी विकास गतिविधियों को जारी रखा जाए। इससे पहले वाईएस जगनमोहन रेड्डी सरकार ने एक बिल विधानसभा में पास किया था। विधानसभा में पास हुए विधेयक के मुताबिक विशाखापट्टनम को कार्यकारी, अमरावती को विधायी और करनूल को न्यायिक राजधानी बनाया जाना था। सरकार इस कदम को राज्य के विकास के लिए जरूरी बता रही थी। वहीं दूसरी ओर आंध्र प्रदेश की विपक्षी पार्टियां सरकार के फैसले का व्यापक विरोध कर रही थी।

अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य विधायिका के लिए, आंध्र प्रदेश कैपिटल सिटी लैंड पूलिंग स्कीम नियम, 2015 के तहत जमा की गई भूमि, और आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2014 की धारा 3 के तहत राजधानी को स्थानांतरित करने, विभाजित करने या तीन भागों में विभाजित करने तथा उच्च न्यायालय सहित सरकार के तीन अंगों से संबंधित विभागों के मुख्यालयों को अधिसूचित राजधानी शहर के अलावा किसी भी क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए कोई कानून बनाने की शक्ति नहीं है।

संविधान के अनुच्छेद 4 में नियोजित भाषा के अनुसार, राज्य में विधायिका, कार्यकारिणी और न्यायिक अंगों की स्थापना संबंधी मामलों में निणर्य लेने की शक्ति केवल संसद के पास है। अनुच्छेद 4 के अनुसार, नए राज्यों की स्थापना और नए राज्यों के गठन और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों के परिवर्तन हेतु बनाए गए कानूनों को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन के रूप में नहीं समझा जाएगा।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब राज्य सरकार के सामने बस दो विकल्प है। पहला, उच्च न्यायालय के फैसले को लागू करे और अमरावती को राज्य की राजधानी के तौर पर विकसित करे। दूसरा उच्चततम न्यायलय में इस फैसले के विरुद्ध अपील दायर करे। लेकिन सरकार उच्चतम न्यायालय जाने के बारे में निर्णय नहीं ले पा रही है। दूसरी तरफ, अमरावती में छह माह की निर्धारित समय सीमा के अंदर विकास गतिविधियों को पूरा करना करीब-करीब असंभव प्रतीत होता है, क्योंकि सरकार के पास जरूरी धनराशि समेत आवश्यक संसाधनों का अभाव है।

दरअसल 2009 में तेलंगाना के निर्माण के लिए आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद हैदराबाद बतौर राजधानी तेलंगाना के हिस्से में चला गया। इसके बाद, चंद्रबाबू नायडू ने एक बड़ी योजना तैयार करते हुए अमरावती के नाम से एक नई राजधानी बनाने का काम शुरू किया। इसके लिए गुंटूर और कृष्णा जिलों के 29 गांवों में जमीन का अधिग्रहण किया गया। स्थायी राजधानी के लिए मास्टर प्लान भी तैयार कर लिया गया था। लेकिन आलोचकों ने यह शिकायत की, कि चंद्रबाबू और उनके टीडीपी नेताओं ने इन इलाकों में हजारों एकड़ जमीन खरीद लिया था और यहां राजधानी की योजना बनाकर करोड़ों का मुनाफा कमाने के फिराक में हैं।

इसके बाद साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में चंद्रबाबू की हार हो गई। हार के बाद अमरावती को राजधानी बनाने का उनका सपना चकनाचूर हो गया। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह बदला लेने की इच्छा थी जिसकी वजह से जगन ने तीन राजधानियों का प्रस्ताव पेश किया और अमरावती को राजधानी बनने की राह में रोड़े खड़े कर दिये। जगन रेड्डी की योजना के मुताबिक अमरावती को केवल राज्य विधायी राजधानी बनाया जाना था। जहां केवल राज्य की विधानसभा होती। उत्तरी इलाके में स्थिति विशाखापटनम को कार्यकारी राजधानी बनाया जाता, जहां सरकार बैठती। जबकि करनूल न्यायिक राजधानी होती, जहां राज्य का हाईकोर्ट होता। इस प्रकार, आंध्र प्रदेश के तीनों क्षेत्रों, उत्तर में सीमांध्र, राज्य का तटीय इलाका और दक्षिण में रायलसीमा में अलग-अलग राजधानियां होतीं, जो लोगों की जरूरतों को पूरा करती।

मामले को लेकर विशेषज्ञों की अलग अलग राय है कुछ लोग मानते हैं कि जगन रेड्डी की योजना के अपने फायदे थे। यह तीनों क्षेत्रों को महत्व देने और सरकार में उनकी हिस्सेदारी देने का प्रयास था। इस तरह की योजना को दूसरे बड़े राज्यों में भी अपनाया जा सकता है। वही कुछ लोग मानते हैं अमरावती को राजधानी के रूप में विकसित करने के लिए जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का निर्देश समझदारी भरा है। क्योंकि पहले से कर्ज में डूबा राज्य संसाधनों की इतनी बर्बादी बर्दाश्त नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने रेड्डी को एक मौका दिया है। उसे गलत थ्री-कैपिटल प्लान को छोड़ देना चाहिए। 

जानिए क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड जो हिजाब कंट्रोवर्सी को करेगा खत्म!

 देश भर में चल रहा हिजाब कंट्रोवर्सी धीरे-धीरे नासूर बनता जा रहा है। कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक सभी राजनैतिक पार्टियां हिजाब के समर्थन और विरोध में अपनी अलग-अलग दलीलें दे रहे हैं... लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि स्कूलों में स्कूल की यूनिफॉर्म पहनी जाएगी या कोई भी छात्र अपनी मर्जी से कुछ भी कपड़े पहनकर आ सकता है। बात सोचने वाली है। क्या आपने कभी किसी महिला डॉक्टर को हिजाब में इलाज करते हुए देखा है। या फिर क्या कभी किसी महिला वकील को कोर्ट में जज के सामने बहस करते हुए देखा है। जिस स्कूल में हिजाब को लेकर कंट्रोवर्सी चल रही उस स्कूल में क्या मुस्लिम अध्यापिका हिजाब पहनकर पढ़ाती है। ऐसे कई उदाहरण है जो ये साबित करता है कि हिजाब कोई मुद्दा नहीं है बल्कि राजनीति पार्टियों अपनी राग और अपनी डफली को अपनी तरीके से बजा रहे हैं।

 

यहां मूल विषय यह है कि स्कूलों में हर संप्रदाय के छात्र-छात्राएं हो सकते हैं और उन्हें स्कूल के मुताबिक ड्रेस का चयन करना चाहिए। छात्रों के बीच न तो केसरिया रंग का गमछा होना चाहिए और न ही नकाब होना चाहिए। इसलिए कर्नाटक हिजाब विवाद के बीच कई जानकर इसका सॉल्यूशन आज यूनिफॉर्म सिविल कोर्ड को बता रहे हैं। तो चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ये यूनिफॉर्म सिविल कोड है क्या? ये संविधान से कैसे जुड़ा है। हिजाब कंट्रोवर्सी के पीछे यूनिफॉर्म सिविल कोड का क्या कनेक्शन है? क्या इसके लागू होने से भगवा गमछा और हिजाब पर रोक लग जाएगी? आज के इस वीडियों में हम इन सभी सवाल का जवाब देंगे वो भी साधारण भाषा में।

सबसे पहले आप इस यूनिफॉर्म शब्द से कन्फ्यूज मत होइए क्योंकि यहां यूनिफॉर्म से मतलब ड्रेस से नहीं हैं बल्कि समानता से है। वैसे तो यूनिफॉर्म सिविस कोड का सीधा मतलब होता है देश के हर नागरीक के लिए एक समान कानून। साधारण भाषा में कहे तो समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष कानून होता है जो सभी धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हर मजहब के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा यानी मुस्लिमों को भी तीन शादियां करने और पत्नी को महज तीन बार तलाक बोले देने से रिश्ता खत्म कर देने वाली परंपरा खत्म हो जाएगी। वर्तमान में देश हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के अधीन करते हैं। फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। जानकार बताते हैं कि हर धर्म में अलग-अलग कानून होने से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। कॉमन सिविल कोड आ जाने से इस मुश्किल से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े ज्यादतर मामलों के निपटारे जल्द होंगे।

हलांकि समान नागरिक संहिता का विरोध करने वालों का कहना है कि यह सभी धर्मों पर हिंदू कानून को लागू करने जैसा होगा। इस पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को बड़ी आपत्ति रही है। उनका कहना है कि अगर सबके लिए समान कानून लागू कर दिया गया तो उनके अधिकारों का हनन होगा। मुसलमानों को तीन शादियां करने का अधिकार नहीं रहेगा। उन्हें अपनी बीवी को तलाक देने के लिए कानून के जरिये जाना होगा। वह अपनी शरीयत के हिसाब से जायदाद का बंटवारा नहीं कर सकेंगे।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट जैसे कई देशों में यूनिफॉर्म सिविल कोड पहले से लागू है। हमारे देश के संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करना अनुच्छेद 44 के तहत राज्य की जिम्मेदारी बताया गया है, लेकिन ये आज तक देश में लागू नहीं हो पाया। इसे लेकर एक बड़ी बहस चलती रही है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध भारत में राजनीतिक हितों को साधने का एक हथियार बन चुका है। आसान शब्दों में कहा जाए, तो हालिया हिजाब विवाद केंद्र सरकार के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने का माहौल तैयार कर रहा है. लेकिन, यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना इतना आसान नहीं होने वाला है। लेकिन, देश की एकता और अखंडता के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड अब कहीं ज्यादा जरूरी नजर आता है। आसान शब्दों में कहा जाए, तो अगर इस तरह के विवादों को यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करके खत्म नहीं किया गया, तो भविष्य में यह एक भयावह रूप लेता हुआ नजर आ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2022

 

आज 8 मार्च है और पूरी दुनिया भर में आज महिला दिवस मनाया जा रहा है। महिला दिवस के बहाने आज हम देश-दुनिया की ऐसी महिलाओं को याद करते हैं जिन्होंने वैश्विक पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इस खास दिन को मनाने का मकसद उन महिलाओं की उपलब्धियों, उनके जज्बे, उनकी ऐतिहासिक यात्राओं और उनके जीवन को याद करना होता है। हर साल महिला दिवस किसी ना किसी थीम पर आधारित होता है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2022 की थीम ‘जेंडर इक्वालिटी टुडे फॉर ए सस्टेनेबल टुमारो’ यानी मजबूत भव‍िष्‍य के ल‍िए लैंग‍िक समानता जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास एक सदी से भी पुराना है। पहली बार साल 1911 में महिला दिवस मनाया गया था। सबसे पहले साल 1909 में न्यूयॉर्क में एक समाजवादी राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में महिला दिवस का आयोजन किया गया था। फिर 1917 में सोवियत संघ ने इस दिन को एक राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को खत्म करने के लिए दुनिया भर में इस दिन को मनाया जाता है। भारत में स्त्रियों की दर्जा सर्व श्रेष्ठ है। जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं और जहां स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है।

कहा जाता है दुनिया की सबसे अबूझ पहेली कोई है तो वह है स्त्री! कहते है त्रिया चरित्रं पुरुष्यस्यभाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः। यानी की स्त्री का तत्कालीन चरित्र क्या है और पुरुष का भाग्य कैसा है, ये तो देवता भी नहीं बता सकते, मनुष्य की तो बात ही छोड़ दीजिए। पौराणिक ग्रंथों में भी इस बात का जिक्र मिलता है कि भगवान ब्रह्मा ने इस पूरी सृष्टि को केवल एक ही दिन में बना दिया था। पर जब वह स्त्री की रचना कर रहे थे तो उन्हें 6 दिन से भी ज्यादा का समय लग गया। लेकिन फिर भी उनकी रचना अधूरी ही थी। थक-हार कर प्रतीक्षा में बैठे देवदूतों के सब्र का बांध टूट गया। फिर देवदूतों ने भगवान से पूछा कि है प्रभु आपने इस पूरे संसार को यहां तक कि ब्रह्मांड की असीमित रचना भी पलक झपकते कर दी थी। लेकिन आपको स्त्री की रचना करने में इतना समय क्यों लग रहा है। तो भगवान ने कहा यह मेरी अब तक की सबसे अनूठी रचना है। जो बहुत ही अद्भुत है। यह मेरी वह रचना है जिसमें विकट से विकट परिस्थिति को संभालने की शक्ति होगी। यह सबको खुश रख सकती है। यह छोटी मोटी खर्चों से लेकर बड़े से बड़े घाव भी भर सकती है। थके होने पर भी यह लगातार काम कर सकती है और बीमार होने पर भी यह अपना स्वयं देखभाल रख सकती है। इतना सब सुनकर वहां मौजूद देवदूतों ने चकित होकर पूछा कि भगवान यह सब कुछ दो हाथों से कर पाना संभव है। तब भगवान कहते हैं कि इसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। देवदूत ने नजदीक जाकर स्त्री को छू कर देखा फिर बोले- प्रभु यह तो बहुत नाजुक है। तो जवाब में भगवान कहते हैं  आप सही कह रहे हो यह बाहर से बहुत ही नाजुक है, मगर इसे अंदर से बहुत मजबूत बनाया है। इसमें हर परिस्थितियों का संभालने की ताकत है। यह कोमल है पर कमजोर नहीं है। देवदूत ने नजदीक जाकर स्त्री के गालों को हाथ लगाया और बोला- भगवान ये तो गीले हैं। लगता है इसमें से कुछ बह रहा है। भगवान बोले- यह इसके आंसू हैं। जो इसकी ताकत है। आंसू इसको फरियाद करने और प्यार जताने का तरीका है। इतना सुनकर देवदुत ने पूछा- भगवान आपकी रचना अदभुत है।  लेकिन क्या ये संपूर्ण है। भगवान बोले- नहीं, यह संपूर्ण नहीं है। इसमें एक त्रुटि है। इतने गुण धर्म होने के बावजूद भी यह स्वयं अपनी महत्ता से अनभिज्ञ अनजान रहेगी।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि नारी जाति ईश्वर की अब तक की सबसे सुंदर अद्भुत रचना है। दुनिया का प्रत्येक पुरुष किसी ना किसी रूप में नारी पर ही आश्रित है। चाहे वह मां हो, पत्नी हो, या मित्र हो। नारी का कोई भी रूप हो कैसा भी रूप हो, यदि पुरुष नारी का सम्मान करता है तो वह सदैव सुखी रहता है। जैसे साक्षात भगवान शिव शक्ति के बिना अधूरे हैं। ब्यूरो रिपोर्ट ओजांक टाइम्स

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चाणक्य वैदिक राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्र के रचियता

 

मनुष्य की जीवीका को अर्थ कहते हैं। और जिस धरा पर मनुष्य वास करते हैं उसे भी अर्थ कहते हैं। इस भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने के उपाय का  निरूपन करने वाले शास्त्र को अर्थशास्त्र कहते हैं। और अपने आज के इस एपिसोड में हम बात करने जा रहें हैं एक ऐसे ही शख्सियत की जिसका नाम आज भी पूरी दुनिया में आसमान में ध्रुव तारे की तरह चमकता है। कश्मिर से लेकर कन्याकुमारी तक। गांधार से लेकर आसम तक एक भारत हो सकता है। पर एक नहीं, दो नहीं, तीन सौ साल पहले नहीं, बल्कि आज से 2300 साल पहले ये सोच उस व्यक्ति कि है जिसे इतिहास में तीन अलग-अलग नाम से जाना जाता है। विष्णुगुप्त। चाणक्य। या कौटिल्य ।

2300 साल पहले के राजनीतिक मानचित्र में मगध साम्राज्य की सीमाएं उत्तर पश्चिम में अफगानिस्तान, पूर्व में असम और दक्षिण में गोदावरी तक फैली हुई है। जी हां उस समय कवेल भारत ही नहीं बल्कि विश्व का सबसे बड़ा और एक अखंड साम्राज्य था मगध साम्राज्य। और इस साम्राज्य की कौटिल्य ने अपनी सूझ-बूझ से नीव रखी थी। और इससे भी बड़ी बात उन्होंने ना केवल एक साम्राज्य खड़ा किया था बल्कि साम्राज्य को, देश को, जनता के हित में कैसे चलाते हैं। इसकी पूरी रूप रेखा तैयार कर दी थी। राजा कैसा होगा। मंत्री कितने और कैसे होंगे। भ्रष्टाचार को कैसे रोका जाएगा। इस तरह के तमाम बातों के सहारे कौटिल्य ने महान मौर्य साम्राज्य खड़ा किया था। और अपनी किताब अर्थशास्त्र के जरिए ऐसी धरोहर छोड़ी जिसकी वजह से कई लोग यह कहते हैं कि भारत को समझना हो या फिर भारतीय को समझना हो तो पहले अर्थशास्त्र को समझो। कौटिल्य को समझो। कौटिल्य और उनके अर्थशास्त्र का मूल अर्थ है राजधर्म। राजधर्म होता क्या है। राजा कहें या शासक, उसकी प्रजा के प्रति क्या जिम्मेदारी होती है। इसे आज से लगभग 2300 साल पहले चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में बताया था।

आचार्य चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त इनके बारे में बताने से पहले आपको अतित में लेकर चलते हैं। मगध के सीमावर्ती नगर में एक साधारण ब्राह्मण आचार्य चणक रहते थे। चणक मगथ के राजा से असंतुष्ठ थे। चणक किसी भी तरह महामात्य के पद पर पहुंचकर राज्य को विदेशी आक्रमणकर्ताओं से बचाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपने मित्र अमात्य शकटार से मंत्रणा कर धनानंद को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई। लेकिन गुप्तचर के द्वारा महामात्य राक्षस और कात्यायन को इस षड्यंत्र का पता लग गया। जिसके बाद चणक को बंदी बना कर देशद्रोह के आरोप में फांसी पर चढ़ा दिया। चणक का कटा हुआ सिर राजधानी के चौराहे पर टांग दिया गया। पिता के कटे हुए सिर को देखकर कौटिल्य की आंखों से आंसू टपक रहे थे। उस वक्त चाणक्य की आयु 14 वर्ष थी। रात के अंधेरे में उसने बांस पर टंगे अपने पिता के सिर को धीरे-धीरे नीचे उतारा और एक कपड़े में लपेट कर चल दिया। अकेले पुत्र ने पिता का दाह-संस्कार किया। तब कौटिल्य ने गंगा का जल हाथ में लेकर शपथ ली- हे गंगे, जब तक हत्यारे धनानंद से अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध नहीं लूंगा तब तक पकाई हुई कोई वस्तु नहीं खाऊंगा। जब तक महामात्य के रक्त से अपने बाल नहीं रंग लूंगा तब तक यह शिखा खुली ही रखूंगा।

कौटिल्य के पिता की मृत्यु के बाद एक विद्वान पंडित राधा मोहन ने उनकी क्षमताओं को भांप लिया और उनका दाखिला तक्षशिला विश्वविद्यालय में करा दिया। यहां से उनके जीवन की नई शुरुआत हुई। शिक्षा ग्रहण करने के बाद आचार्य ने उसी विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य संपन्न किया और अनेक ग्रंथों की रचना की। तक्षशिला में चाणक्य ने न केवल छात्र, कुलपति और बड़े बड़े विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया बल्की उसने पड़ोसी राज्य के राजा पोरस से भी अपना परिचय बढ़ा लिया। सिकंदर के आक्रमण के समय चाणक्य ने पोरस का साथ दिया। सिकंदर की हार और तक्षशिला पर सिकंदर के प्रवेश के बाद विष्णुगुप्त अपने गृह प्रदेश मगध चले गए और यहां से शुरू किया एक नया जीवन।

मगध पहुंच कर सबसे पहले कौटिल्य ने विष्णुगुप्त नाम से अपने पिता के प्रिय मित्र शकटार से मुलाकात की। फिर शकटार के साथ मिलकर घनानंद के खिलाफ योजना बनाई। योजना के तहत शकटार ने विष्णुगुप्त को चंद्रगुप्त से मिलवाया। उन दिनों किसी संदेह के कारण धनानंद ने चंद्रगुप्त उसकी मां को जंगल में रहने के लिए विवश कर दिया था। शकटार और चाणक्य ज्योतिष का वेश धरकर चंद्रगुप्त से मिलने जंगल में पहुंचे जहां चाणक्य ने पहली बार चंद्रगुप्त को राजा का एक खेल खेलते हुए देखा। तब चाणक्य ने चंद्रगुप्त को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और फिर शुरु हुआ चाणक्य का नया जीवन। कौटिल्य उर्फ विष्णु गुप्त अथार्त चणक पुत्र चाणक्य ने तब चंद्रगुप्त को शिक्षा और दीक्षा देने के साथ ही भील, आदिवासी और वनवासियों को मिलाकर सेना तैयार किया और फिर धननंद के साम्राज्य को उखाड़ फेंककर चंद्रगुप्त को मगथ का सम्राट बनाया। बाद में चंद्रगुप्त के साथ ही उसके पुत्र बिंदुसार और पौत्र सम्राट अशोक को भी चाणक्य ने महामंत्री पद पर रहकर मार्गदर्शन दिया।

चाणक्य का उल्लेख मुद्राराक्षस, बृहत्कथाकोश, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, बौद्ध ग्रंथ महावंश, जैन पुराण में भी मिलता है। बृहत्कथाकोश अनुसार चाणक्य की पत्नी का नाम यशोमती था। चाणक्य ने तक्षशिला के विद्यालय में अपनी पढ़ाई पुरी की। फिर कौटिल्य के नाम से अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र लिखा। कहा तो ये भी जाता है कि वात्स्यायन नाम से उन्होंने ही कामसुत्र भी लिखा था।

कुछ विद्वानों के मुताबिक कौटिल्य का जन्म पंजाब के 'चणक' क्षेत्र में हुआ था अर्थात आज का चंडीगढ, जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि उसका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था। कुछ बौद्ध साहित्यों ने उसे तक्षशिला का निवासी बताया है। चाणक्य कि पिता चणक हैं और उनकी माता चनेश्वरी थी। जन्म के समया कौटिल्य के पास एक ज्ञान दांत था। ऐसी मान्यता थी कि ज्ञान दांत का होना राजा बनने की निशानी है। उनकी मां एक बार एक ज्योतिषी की बातें सुनकर डर गईं कि वह बड़ा होकर राजा बनेगा और राजा बनने के बाद मुझे भूल जाएगा। तब इन्होंने अपने ज्ञान दांत तोड़ दिए और अपनी मां से वादा किया कि मैं तुम से दूर कभी नहीं जाउंगा। चाणक्य बड़े होकर आचार्य बने लेकिन उनकी रुचि राजकाज में थी। दंड नीति में थी। राजकाज कैसे चलना चाहिए इन बातों पर थी।

चाणक्य एक कुशल और महान चरित्र वाले व्यक्ति थे इसके साथ ही वे एक महान शिक्षक भी थे। अपने महान विचारों और महान नीतियों से वे काफी लोकप्रिय हो गए थे उनकी ख्याति सातवें आसमान पर थी लेकिन इस दौरान ऐसी दो घटनाएं घटी की आचार्य चाणक्य का पूरा जीवन ही बदल गया। पहली घटना– मगध के शासक द्वारा कौटिल्य के पिता की हत्या। और दूसरी घटना- भारत पर सिकंदर का आक्रमण और तात्कालिक छोटे राज्यों की ह्रार। ये दो घटनाएं उनके जीवन की ऐसी घटनाएं हैं जिनकी वजह से कौटिल्य ने देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने का संकल्प लिया और उन्होनें शिक्षक बनकर बच्चों के पढ़ाने के बजाय देश के शासकों को शिक्षित करने और उचित नीतियों को सिखाने का फैसला लिया और आज इतिहास गवाह है वे अपने दृढ़ संकल्प में सफल भी रहे

आचार्य चाणक्य की मौत के बारे में कई तरह की बातों का उल्लेख मिलता है। कहते हैं कि वे अपने सभी कार्यों को पूरा करने के बाद एक दिन एक रथ पर सवार होकर मगध से दूर जंगलों में चले गए थे और उसके बाद वे कभी नहीं लौटे। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उन्हें मगध की रानी हेलेना द्वारा जहर देकर मार दिया गया था। कुछ मानते हैं कि हेलेना ने उनकी हत्या किसी और से करवा दी थी। एक दूसरी कहानी के अनुसार बिंदुसार के मंत्री सुबंधु ने आचार्य को जिंदा जलाने की कोशिश की थी, जिसमें वे सफल भी हुए। हालांकि ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार चाणक्य ने खुद प्राण त्यागे थे या फिर वे किसी षड़यंत्र का शिकार हुए थे यह आज तक साफ नहीं हो पाया है।

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