सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

टीपू सुल्तान

एक ऐसा शासक जो कहलाता था मैसूर का शेर... जिसकी तलवार की धार से कांपते थे अंग्रेज... जिसने बनाया था संसार का पहला रॉकेट... ऐसे महान भारतीय शासक.. जिसकी बहादुरी का लोहा सारा संसार मानता है...  ऐसा शासक जो स्वयं राजा होते हुए भी नागरिक कहलाना पसन्द करता था... हम बात कर रहें हैं मैसूर के शेर के नाम से प्रसिद्ध टीपू सुल्तान की... जिसे आधुनिक राकेट विज्ञान के जनक के रूप में भी जाना जाता है.. एक ऐसा शासक जिसने अंग्रेजों, मराठों और निजामों से लोहा लिया.. वो था नेपोलियन का परम् मित्र.. उसने 15 साल की उम्र में लड़ा था पहला युद्ध... उसके नाम से ही खौफ खाते थे अंग्रेज.... जी हां टीपू सुल्तान ने 17 साल की उम्र में दी थी अंग्रेजों को मात.... 20 साल की उम्र में टीपू सुल्तान ने शेर पर शिकंजा कसते हुए अपने दोस्त की जान बचाई थी... टीपू सुल्तान को भारत का पहला मुस्लिम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी कहा जाता है.... तभी तो उसके नाम से खौफ खाते थे अंग्रेज.... टीपू सुल्तान ने अपने एक मिसाइल से खत्म कर दिया था मैसुर का दूसरा युद्ध... टीपू सुल्तान के लिए कहा जाता है कि वो ऐसा मुस्लिम शासक था जो पहनता था राम नाम की अंगुठी.... टीपू सुल्तान की अंगूठी को युद्ध में हुई मौत के बाद एक अंग्रेज अफसर ने उतार लिया था, जिसे कुछ साल पहले ब्रिटेन में नीलाम किया गया.. इतिहासकारों के मुताबिक टीपू सुल्तान ने एक लाख हिन्दुओं को जबरन मुस्लिम बना दिया था.... अब प्रश्न ये उठता है कि अगर उसने हिंदुओं पर अत्याचार किए तो वह राम नाम अंकित अंगूठी क्यों पहनता था... कहते हैं कि जब अंग्रेज भारत पर कब्जा करने में लगे थे तब दक्षिण भारत में उन्हें रोकने वाला टीपू सुल्तान ही था.. टीपू सुल्तान ने हर वह काम किया जो किसी भी राज्य का राजा अपनी सत्ता को बचाने के लिए करता है.. वैसे तो टीपू सुल्तान को दक्षिण का औरंगजेब भी कहा जाता है.. क्योंकि वक्त पड़ने पर उसने अपने दो बेटों को अंग्रेजों को हाथ गिरवी रख दिया था.. अंग्रेजों से लोहा लेते वक्त उसने एक बार कहा था.. मैं सारी उम्र मेमने की तरह जीने की बजाय एक दिन शेर की तरह जीना पसंद करूंगा...... तभी तो अंग्रेज भी उसके पराक्रम से चकित हो गए थे और उसके साहस के प्रतीक स्वरूप उसकी तलवार अपने साथ ले गए थे..
टीपू सुल्तान का जन्म मैसूर के सुल्तान हैदर अली के घर 20 नवम्बर, 1750 को देवनहल्ली वर्तमान में कर्नाटक का कोलार ज़िला में हुआ था.. टीपू का पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान साहब था.... वक्त बदलता गया और धीरे धीरे सुल्तान फतेह अली खान साहब टीपू सुल्तान बन गया.. अली खान का नाम टीपू सुल्तान आरकोट के औलिया टीपू मस्तान के नाम पर रखा गया.... टीपू के पिता हैदर अली मैसूर के सेनापति थे जो अपनी ताकत के दम पर 1761 में मैसूर के शासक बने थे... टीपू की माता का नाम फ़क़रुन्निसा था.... टीपू सुल्तान ने बचपन में पढ़ाई के साथ साथ सैन्य शिक्षा और राजनीतिक शिक्षा भी ली.. हलांकि टीपू के पिता खुद अनपढ़ थे... टीपू बचपन से ही इतने प्रभावसाली थे की 17 साल के उम्र में उनको महत्वपूर्ण राजनायिक और सैन्य मिशन में स्वतंत्र प्रभार दे दिया गया... टीपू सुल्तान के पिता ने दक्षिण में अपनी शक्ति का विस्तार आरंभ किया था। इस कारण अंग्रेज़ों के साथ-साथ निजाम और मराठे भी उसके शत्रु बन गए थे.. टीपू ने 18 वर्ष की उम्र में अंग्रेज़ों के विरुद्ध पहला युद्ध जीता था.. टीपू सुल्तान बहादुर होने के साथ ही दिमागी सूझबूझ से रणनीति बनाने में भी बेहद माहिर था.. उसने अपने शासनकाल में भारत में बढ़ते ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य के सामने कभी नहीं झुका और अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया.. मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेज़ों को खदेड़ने में उसने अपने पिता हैदर अली की काफ़ी मदद की.. उसने अपनी बहादुरी से जहां कई बार अंग्रेज़ों को पटखनी दी, वहीं निज़ामों को भी कई मौकों पर धूल चटाई.. टीपू सुल्तान एक गजब का योद्धा होने के साथ योग्य शासक भी था...  उसने पहली बार अंग्रेजी फौज के खिलाफ रॉकेटों का उपयोग किया था.. 1772 और 1799 में श्रीरंगपट्टनम में दो लड़ाइयां हुईं.. इनमें टीपू के सिपाहियों ने 6 से लेकर 12 पौंड तक के रॉकेट फिरंगियों पर फेंके.. ये रॉकेट लोहे की नली के बने थे.. उन रॉकेटों की मारक क्षमता एक से डेढ़ मील तक होती थी.. ये रॉकेट ठीक निशाने पर तो नहीं लगते थे, लेकिन वे बड़ी संख्या में छोड़े जाते थे..  जिससे अंग्रेजों की फौज परेशान हो जाते थे..
18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में टिपू एक ऐसा महान शासक था जिसने अंग्रेजों को भारत से निकालने का प्रयत्न किया... अपने पिता हैदर अली के निधन के बाद 1782 में टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठा.. टीपू प्रजा की तकलीफों का काफी ध्यान रखता था.. तभी उसके शासन काल में किसान प्रसन्न थे...  इसमें कोई दो राय नहीं की टीपू सुल्तान एक विद्वान, कुशल़ और योग्य सेनापति था.. टीपू को उनके दादाजी फ़तेह मुहम्मद के नाम पर फ़तेह अली भी कहा जाता था.. 17 वर्ष की उम्र में उनको महत्वपूर्ण राजनयिक और सैन्य मिशन में स्वतंत्र प्रभार दे दिया गया.. वो युद्ध में अपने पिता का दायां हाथ था, जिसकी सहायता से हैदर अली दक्षिणी भारत का एक शक्तिशाली शासक बना.. 17 वर्ष की उम्र में ही टीपू ने अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध लड़ा और अंग्रेजों को धुल चटाई.. 20 साल की उम्र में टीपू अपने फ्रेंच दोस्त के साथ शिकार करने गया जहां उसके दोस्त पर एक शेर ने हमला कर दिया जिसको टीपू ने बिना हथियार के ही मार दिया तबसे इन्हें टाइगर आफ मैसूर के नाम से जाना जाने लगा.. शेर इनकी हुकुमत का प्रतीक भी था.. टीपू सुल्तान ने दक्षिण के सभी छोटे राज्यों को जीत लिया..  उन्होंने दक्षिण के निजामों और अंग्रेजों से हारे भारतीय शासकों को भी हराया..  टीपू एक सूफी संत बनना चाहता था लेकिन उसके पिता ने उसे योद्धा बनने के लिए बाध्य किया.. 'टाइगर ऑफ मैसूर' कहे जाने वाले टीपू सुल्तान का प्रतीक चिन्ह बाघ था जो उनसे जुड़ी चीजों पर प्रमुख रूप से अंकित मिलता है.. टीपू द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद मराठों एवं निजाम ने अंग्रेजों से संधि कर ली थी. ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेजों से संधि का प्रस्ताव दिया. वैसे अंग्रेजों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था इसलिए छिपे मन से वे भी संधि चाहते थे. दोनों पक्षों में वार्ता मार्च, 1784 में हुई और इसी के फलस्वरूप 'मंगलौर की संधि' सम्पन्न हुई... टीपू सुल्तान को दुनिया का पहला मिसाइल मैन माना जाता है. बीबीसी की एक खबर के मुताबिक, लंदन के मशहूर साइंस म्यूजियम में टीपू सुल्तान के रॉकेट रखे हुए हैं. इन रॉकेटों को 18वीं सदी के अंत में अंग्रेज अपने साथ लेते गए थे.
टीपू सुल्तान एंटी हिंदू था या नहीं ये तो बहस की बात है लेकिन इतिहास में दर्ज टीपू सुल्तान से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं जो उसे इतिहास हीरो मानता है... 19वीं सदी में ब्रिटिश गवर्मेंट के अधिकारी और लेखक विलियम लोगान ने अपनी किताब 'मालाबार मैनुअल' में लिखा है कि टीपू सुल्तान ने अपने 30,000 सैनिकों के दल के साथ कालीकट में तबाही मचाई थी.. किताब में विलियम ने यह भी लिखा हैं कि शहर के मंदिर और चर्चों को तोड़ने के आदेश दिए गए. यहीं नहीं, हिंदू और इसाई महिलाओं की शादी जबरन मुस्लिम युवकों से कराई गई. पुरुषों से मुस्लिम धर्म अपनाने को कहा गया और जिसने भी इससे इंकार किया उसे मार डालने का आदेश दिया गया... श्रृंगेरी शंकराचार्य के मंदिर और मठ शंकराचार्य को लिखी एक चिट्ठी में मठ पर हुए हमले पर टीपू सुल्तान ने आक्रोश और दु:ख व्यक्त किया था.. इसके बाद टीपू ने बेदनुर के आसफ़ को आदेश दिया कि शंकराचार्य को 200 फ़नम नक़द धन और अन्य उपहार दिये जाएं.. श्रृंगेरी मंदिर में टीपू सुल्तान की दिलचस्पी काफ़ी सालों तक जारी रही, और 1790 के दशक में भी वे शंकराचार्य को खत लिखते रहे... यह भी सही है कि लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराने वाला टीपू सुल्तान ने कई मन्दिरों को भी तोहफ़े पेश किए थे..  मेलकोट के मन्दिर में सोने और चांदी के बर्तन है, जिनके शिलालेख बताते हैं कि ये टीपू सुल्तान ने भेंट किए थे.. टीपू सुल्तान ने कलाले के लक्ष्मीकान्त मन्दिर को चार रजत कप भेंटस्वरूप दिए थे.. 1782 से 1799 के बीच, टीपू सुल्तान ने अपनी जागीर के मन्दिरों को 34 दान के सनद जारी किया था... ननजनगुड के श्रीकान्तेश्वर मन्दिर में टीपू का दिया हुआ एक रत्न-जड़ित कप है.. ननजुनदेश्वर मन्दिर को टीपू सुल्चान ने एक हरा-सा शिवलिंग भेंट किया था.. श्रीरंगपटना के रंगनाथ मन्दिर को टीपू ने सात चांदी के कप और एक रजत कपूर-ज्वालिक भेंट में दिया था.. कुछ लोगों का दावा है कि ये दान हिंदू शासकों के साथ गठबंधन बनाने का एक तरीका था।

टीपू सुल्तान एक बादशाह बन कर पूरे देश पर राज करना चाहता था लेकिन उसकी ये इच्छा पूरी नही हुई.. टीपू सुल्तान ने 1782 में अपने पिता के निधन के बाद मैसूर की कमान संभाला और अपने अल्प समय के शासनकाल में ही विकास कार्यों की झड़ी लगा दी थी.. उसने जल भंडारण के लिए कावेरी नदी पर बांध बंधवाया था जो आज कृष्णराज सागर बांध के नाम से जाना जाता है.. टीपू निःसन्देह एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सेनापति था.. उसने 'आधुनिक कैलेण्डर' की शुरुआत की और सिक्का ढुलाई और नाप-तोप की नई प्रणाली का प्रयोग किया.. सन् 1799 में अंग्रेजों के खिलाफ चौथे युद्ध में मैसूर की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान की मौत हो गई..  12 बच्चों में से टीपू सुल्तान के सिर्फ़ दो बच्चों के बारे में पता चल पाया है, जबकि 10 बच्चों की जानकारी आज भी किसी के पास नहीं हैं.. टीपू सुल्तान की तलवार का वजन 7 किलो 400 ग्राम है और उस पर रत्नजड़ित बाघ बना हुआ है.. बताया जाता हैं कि टीपू की मौत के बाद ये तलवार उसके शव के पास पड़ी मिली थी.. टीपू का सबसे बड़ा अवगुण यह था कि वह जिद्दी और घमंडी व्यक्ति था.. यही दुर्गुण उसके पराजय का कारण बना... वह फ्रांसिसीयों पर बहुत अधिक भरोसा करता था और देशी राजाओं कि शक्तियों को तुक्ष्य समझता था.. वह अपने पिता के समान ही निरंकुश और स्वंत्रताचारी था.. उसके चरित्र के सम्बंध में विद्वानों में काफी मतभेद है.. अलग अलग अंग्रेज विद्वानों ने उसकी आलोचना करते हुए उसे अत्याचारी और कट्टर बताया है.. कुछ ऐसे भी इतिहासकार है जिन्होंने टीपू के चरित्र की काफी प्रशंसा की है.. कुछ इतिहाकारों ने टीपू को एक परिश्रमी शासक, मौलिक सुधारक और महान योद्धा बताया है... उन दिनों में मैसूर को लेकर एक कहावत मशहूर हुआ करती थी कि टीपू के पिता हैदर अली साम्राज्य स्थापित करने के लिए पैदा हुआ था और टीपू उसे खोने के लिए.. इन सारी बातों के बावजूद वह अपने पिता के समान कुटनीतिज्ञ एवं दूरदर्शी नहीं था यह उसका सबसे बड़ा अवगुण था.. इससे भी बड़ी अवगुण उसकी पराजय थी... अगर उसकी विजय होती तो उसके चरित्र की प्रशंसा कि जाती..

द्वारिका की कहानी

कृष्ण की महिमा के बारे में कौन नहीं जनता.... हर कोइ कृष्ण भगवान को द्वारिकाधीश के नाम से जानते हैं..... दरअसल भगवान द्वारिका के नरेश थे और इसी कारण उनका नाम द्वारिकाधीश पड़ा..... आज हम आपको भगवान कृष्ण के होने का ऐसा साबुत देंगे जिसे आपने सिर्फ सुना होगा.. लेकिन अब आप इसे देख भी सकते है.... भारत के गुजरात में स्थित द्वारका एक प्राचीन शहर था जो समुद्र में समा गया.... चलिए आज हम आपको द्वारिका के रहस्य के बारे में बतातें हैं.... भगवान कृष्ण ने अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से बसाया था..... लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि नष्ट हो गई द्वारिका.... किसने किया द्वारिका को नष्ट.... क्या किसी प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो गई कृष्ण की द्वारिका....  क्या किसी आसमानी ताकत ने नष्ट कर दिया द्वारिका को.... या फिर किसी समुद्री शक्ति ने उजाड़ दिया द्वारिका को..... आखिर ऐसा क्या हुआ कि नष्ट हो गई द्वारिका..... आज हम खोलेंगे इसका रहस्य..... जो आज तक कोई नहीं जानता..... लेकिन इससे पहले जानने की कोशिश करतें है द्वरिका को लेकर इतिहास क्या कहता है... मथुरा ने निकलकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका में एक नया नगर बसाया.. ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया था.. लेकिन, बाद में ऐसा क्या हुआ कि द्वारिका नगरी समुद्र में समा गई.. किसने किया द्वारका को नष्ट? क्या प्राकृतिक आपदा से नष्ट हुई द्वारका? इस सवालों का जवाब पाने की कोशिशें अब तक जारी है... समुद्र में हजारों फीट नीचे द्वारका नगरी के अवशेष मिले हैं।
राजा ययाति के 5 पुत्र थे पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और सबसे छोटा द्रुहु.. इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है.. इतिहासकारों के मुताबिक 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था.. पांचों पुत्रों ने अपने-अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की.. यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई.. इन पांचों कुल के लोगों ने आपस में कई प्रसिद्ध लड़ाइयां लड़ी.. जिनमें से महाभारत का युद्ध बेहद प्रसिद्ध है.. पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े बेटे यदु से कुछ अपेक्षाएं थी जिसके पुरा न होने पर राजा ययाति ने यदु को राज्य से बेदखल कर दिया और श्राप दिया की तुम और तुम्हारे वंशज अपने पिता के बनाए राज में कभी राज नहीं कर सकोगे.... इसलिए द्वारिका को उजड़ने का वजह ययाति का श्राप भी बताया जाता है..  गुजरात राज्य के पश्चिमी छोर पर समुद्र के किनारे स्थित 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारिका बसा था.. कई द्वारों का शहर होने के कारण द्वारिका इसका नाम पड़ा.. इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे.. वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है.. भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका.. द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप भी कहा जाता है.. द्वारिका को लेकर एक और बात कही जाती है कि जब कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के ससुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यदुओं का नामोनिशान मिटा देने की ठान ली.. जिसके बाद जरासंध मथुरा और यादवों पर बारंबार आक्रमण करना शुरू कर दिया.. अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निर्णय लिया.. और कृष्ण अपने पैतृक गांव द्वारिका पहुंच गए जहां वीरान पड़े द्वारिका शहर को फिर से बसाया.. कहा जाता है कृष्ण अपने 18 नए कुल-बंधुओं के साथ द्वारिका आ गए जहां 36 साल राज्य करने के बाद उनका देहावसान हुआ.. द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के वंसज वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे.. द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए.. हस्तिनापुर लाने के बाद अर्जुन ने वज्रनाभ को मथुरा का राजा घोषित कर दिया... यही वजह है कि अब वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है..
आज से हजारों वर्ष पूर्व भगवान कॄष्ण ने द्वारका नगरी को बसाया था। कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होने द्वारका में ही किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं। लेकिन प्रमाण आज तक नहीं मिल सका कि यह क्या है। विज्ञान इसे महाभारतकालीन निर्माण नहीं मानता। काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने यहां पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है.. पुराणों के मुताबिक मथुरा पर लंबे समय तक यादवों के प्रबल शत्रु जरासंध तथा कालयवन के हमले करते रहे... 17 बार इन हमलों का जवाब देने के बाद कृष्ण ने समुद्र से कुछ जमीन मांगी.. समुद्र ने वासुदेव को प्रभास पाटन वर्तमान के सोमनाथ शहर से 20 मील दूर समुद्र में ही जमीन दी थी। हरिवंशपुराण में द्वारिका को पानी का किला कहा गया है.. इससे स्पष्ट होता है कि द्वारिका वास्तव में समुद्र में स्थित एक द्वीप था जहां से निकटस्थ जगहों पर पहुंचने के लिए नावों का सहारा लिया जाता था... पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक कृष्ण के आदेश पर देवताओं के वास्तुकार विश्वकर्मा ने द्वारिका की बसावट का नक्शा बनाया.. जिसके बाद सोने, चांदी, पत्थरों के अलावा अन्य धातुओं से द्वारिका में भवनों का निर्माण कराया गया... निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद कृष्ण ने योगमाया का आश्रय लेकर सभी मथुरावासियों को रात में सोते हुए द्वारिका पहुंचा दिया और सभी को उनकी योग्यता के हिसाब से रहने के स्थान प्रदान किए.. महाभारत के अनुसार द्वारिका की भूमि कृष्ण और राजा शाल्व के बीच हुए युद्ध का भी गवाह बना था द्वारिका... इस युद्ध में राजा शाल्व ने कृष्ण पर उड़ते हुए विमान में बैठकर हमला किया था..
1980 के दशक तक भारतीयों को भी पता नहीं था जिस द्वारिका में जाकर वह भगवान श्रीनाथजी के दर्शन करते हैं वह वास्तविक द्वारिका नहीं है बल्कि अलग है.. 1980 के दशक में भारत सरकार ने जीएसआई के नेतृत्व में समुद्र में एक रिसर्च सर्वे करने का निर्णय लिया इस रिसर्च के दौरान ही खंभात की खाड़ी में ली गई रडार स्कैन इमेजेज से पानी में डूबी हुई द्वारिका की पहली झलक दुनिया को दिखाई दी.. एक मानचित्र की तरह प्रतीत होने वाली इन इमेजेज में एक 5 मील लंबे तथा 2 मील चौड़े क्षेत्रफल में व्यस्थित तरीके से मानव निर्मित संरचनाएं दिखाई दी जिस पर भारत सरकार ने प्रोफेशनलस की टीम बना कर अध्ययन करने का निर्णय लिया। इस टीम ने पानी की गहराई में जाकर डूबे हुए शहर की फोटोग्राफ्स ली और विस्तृत अध्ययन किया। इसके बाद ही द्वारिका को उसका गौरव मिल सका और भारतीयों समेत दुनिया भर के इतिहासकारों ने मानव इतिहास की एक अनूठी और भव्य खोज माना.. एक समय था, जब लोग कहते थे कि द्वारिका नगरी एक काल्‍पनिक नगर है, लेकिन इस कल्‍पना को सच साबित कर दिखाया ऑर्कियोलॉजिस्‍ट प्रो. एसआर राव ने.. प्रो. राव और उनकी टीम ने 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका की दीवार की खोज की.. साथ में उन्‍हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्‍यता के भी कई अवशेष उन्‍होंने खोजे.. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निर्देशन में भारतीय नौसेना के गोताखोरों ने पहले 2005 फिर 2007 में समुद्र में समाई द्वारिका नगरी के अवशेषों के नमूनों को सफलतापूर्वक निकाला। इंडियन नेवी ने द्वारिका को लेकर कुछ ऐसे नमूने इकट्ठे किए जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है.. 2005 में नौसेना के सहयोग से प्राचीन द्वारिका नगरी से जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छंटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने एकत्र किए गए.. गुजरात में कच्छ की खाड़ी के पास स्थित द्वारिका नगर समुद्र तटीय क्षेत्र में नौसेना के गोताखोरों की मदद से पुरा विशेषज्ञों ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद समुद्र के भीतर उत्खनन कार्य किया और वहां पड़े चूना पत्थरों के खंडों को भी ढूंढ निकाला.. नौसेना के गोताखोरों ने 40 हजार वर्गमीटर के दायरे में यह उत्खनन किया और वहां पड़े भवनों के खंडों के नमूने एकत्र किए जिन्हें आरंभिक तौर पर चूना पत्थर बताया गया था। पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि ये खंड बहुत ही विशाल और समृद्धशाली नगर और मंदिर के अवशेष हैं...

वैज्ञानिकों के मुताबिक जब हिमयुग समाप्त हुआ तो समुद्र का जलस्तर बढ़ा और उसमें देश-दुनिया के कई तटवर्ती शहर डूब गए.. द्वारिका भी उन शहरों में से एक था। लेकिन सवाल यह उठता है कि हिमयुग तो आज से 10 हजार वर्ष पूर्व समाप्त हुआ.. भगवान कृष्ण ने तो नई द्वारिका का निर्माण आज से 5 हजार 300 वर्ष पूर्व किया था, तब ऐसे में इसके हिमयुग के दौरान समुद्र में डूब जाने की थ्योरी आधी सच लगती है..  लेकिन बहुत से पुराणकार और इतिहासकार मानते हैं कि द्वारिका को कृष्ण के देहांत के बाद जान-बूझकर नष्ट किया गया था.. पुराणों के मुताबिक श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका महाभारत युद्ध के 36 साल बाद समुद्र में डूबी थी.. द्वारका के समुद्र में डूबने से पहले ही श्रीकृष्ण सहित सभी यदुवंशी भी मारे गए थे.. समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है। एक माता गांधारी द्वारा श्रीकृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को दिया गया श्राप। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था, तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया था कि जिस तरह कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार पूरे यदुवंश का भी नाश होगा... महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे.. यह वह दौर था, जबकि यादव लोग आपस में भयंकर तरीके से लड़ रहे थे। इसके अलावा जरासंध और यवन लोग भी उनके घोर दुश्मन थे.. ऐसे में द्वारिका पर समुद्र के मार्ग से भी आक्रमण हुआ और आसमानी मार्ग से भी आक्रमण किया गया। अंतत: यादवों को उनके क्षेत्र को छोड़कर फिर से मथुरा और उसके आसपास शरण लेना पड़ी.. दुनिया भर के इतिहासकार मानते रहे हैं कि ईसापूर्व भारत में कभी कोई बड़ा शहर नहीं था। परन्तु द्वारिका की खोज ने दुनिया के इतिहासकारों को फिर से सोचने के लिए विवश किया। कार्बन डेटिंग 14 के अनुसार खुदाई में मिली द्वारिका की कहानी 9,000 वर्ष पुरानी है। इस शहर को 9-10,000 वर्षो पहले बसाया गया था। जो लगभग 2000 ईसापूर्व पानी में डूब गई थी.. समुद्र में धरती से 36 मीटर की गहराई पर स्थित है ऐतिहासिक शहर द्वारिका। यहां पर पानी की तेज धारा बहती है जिसके चलते रिसचर्स को अध्ययन में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा। यहां पर बड़े, विशालकाय और भव्य भवनों की संरचनाएं मिली है जिससे इस प्राचीन शहर की भव्यता का सहज ही अंदाजा होता है 

नर्गिस- एक प्रेम कहानी

नर्गिस दत्त का जन्म फातिमा अब्दुल रशीद के रूप में 1 जून, 1929 को कलकत्ता में हुआ था। नर्गिस के पिता उत्तमचंद मूलचंद माता जद्दनबाई तथा दो भाई, अख्तर व अनवर हुसैन थे। नरगिस की माता गायक, नर्तक, निर्देशक, संगीतकार और अभिनेत्री के रूप में एक हरफनमौला थी।वह चाहती थी कि उनकी बेटी भी फ़िल्मों में काम करे।लेकिन बचपन से ही नर्गिस के दिल में डॉक्टर बनने की ख्वाहिश थी। मां के कहने पर नर्गिस ने 6 वर्ष की आयु में भारतीय फिल्मों में प्रवेश कर लिया था। नर्गिस की बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट फिल्म तलाश-ए-हक़ थी जो 1935 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म से उनका नाम नर्गिस पड़ा था।चौदह वर्ष की उम्र में निर्देशक महबूब खान की फिल्म 'तक़दीर' में मोतीलाल की हीरोइन के तौर पर उनका पहला ऑडीशन हुआ था। 1941 में नर्गिस की मां ने उन्हे महबूब खान की नई फ़िल्म के लिए स्क्रीन टेस्ट देने के लिए कहा. लेकिन नर्गिस फ़िल्मों में आना ही नहीं चाहती थी, इसलिए उन्होने स्क्रीन टेस्ट में खराब से खराब परफ़ॉर्म किया ताकि महबूब खान उन्हे इस फ़िल्म में ना ले. लेकिन महबूब खान नर्गिस की खूबसूरती से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने स्क्रीन टेस्ट को दरकिनार करके नर्गिस को अपनी फ़िल्म की लीड एक्ट्रेस चुन लिया. नर्गिस की पहली फ़िल्म 1943 में तकदीर आई. हांलांकि ये फ़िल्म ज्यादा नहीं चली लेकिन नरगिस के काम की खूब सराहना हुई. इसके बाद नरगिस ने कुछ और फ़िल्मों में काम किया, लेकिन उन्हे वो बड़ी सफ़लता नहीं सकी जिसकी उन्हे तलाश थी. नर्गिस की तलाश खत्म 1948 में हुई जब उनकी फ़िल्म मेला रिलीज हुई.इस फ़िल्म में नरगिस के स्क्रीन पार्टनर थे दिलीप कुमार. इसके बाद नर्गिस ने कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा. इसी साल आई उनकी एक और फ़िल्म अनोखा प्यार ने भी अच्छा कारोबार किया.1948 का ये साल नर्गिस की जिंदगी के लिए बेहद अहम साल था, क्योंकि इसी साल आई थी फ़िल्म आग. इस फ़िल्म में नर्गिस के हीरो थे राजकपूर. मतलब वो जोड़ी जिसने आगे चलकर कई हिट फ़िल्में तो दी थी, मोहब्बत का एक ऐसा तराना भी छेड़ा जिसे आज तक गुनगुनाया जाता है.
राज कपूर और नर्गिस 1940-1960 के दशक की बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत और पॉपुलर जोड़ियों में से एक थी। दोनों सिर्फ़ रील लाइफ में नहीं बल्कि रियल लाइफ में भी रोमांटिक कपल थे। उन दिनों इनकी ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों खूब पसंद करते थे। नर्गिस ने राजकपूर के साथ कुल 16 फिल्में की, जिनमें से 6 फिल्में आर.के.बैनर की ही थी.. फिल्मों के फेहरिस्त में आग, बरसात, अंदाज़, आवारा, आह, श्री 420, जागते रहो और चोरी-चोरी जैसी यादगार फिल्में शामिल हैं.. लेखिका मधु जैन की किताब 'द कपूर्स' के मुताबिक जब बरसात बन रही थी तब नर्गिस पूरी तरह से राज कपूर के लिए समर्पित हो चुकी थीं। यहां तक कि जब स्टूडियो में पैसे की कमी हुई तो नर्गिस ने अपनी सोने की चूड़ियां बेच दी.. कहा तो यह भी जाता था कि नर्गिस दूसरे निर्माताओं की फिल्मों में काम करके आर.के फिल्म्स की खाली तिजोरी को भरने का काम किया.. जब नरगिस 19 साल की थीं तब उनका राजकपूर के साथ रिश्ता जुड़ा। धीरे-धीरे ये रिलेशन प्यार में बदल गया। बाद में नरगिस को इस बात का अहसास हुआ कि ये प्यार एकतरफा था.. चाह कर भी राजकपूर नर्गिस के शादी नहीं कर सकते थे क्योंकि राजकपूर शादीशुदा थे और वो अपनी पत्नी कृष्णा कपूर और बच्चों को छोड़कर नर्गिस से शादी नहीं कर सकते थे.. मजबूरी कहें या फिर वक्त की नजाकत राजकपूर नर्गिस से बेइंतहा प्यार करते थे...जब राजकपूर को पता चला कि नर्गिस ने सुनील दत्त से शादी कर ली है तो वो आपे से बाहर हो गए.. वह अपने दोस्तों के सामने ही फूट-फूटकर रोने लगे अफवाह तो ये भी थी कि उन्होंने जलती हुई सिगरेट से खुद को जलाकर ये जानने की कोशिश की कि कहीं वो कोई सपना तो नहीं देख रहे.. राजकपूर और नर्गिस के बीच अलगाव की पहली दरार रूस यात्रा के दौरान आई.. तब तक 'आवारा' रूस की अघोषित राष्ट्रीय फ़िल्म हो चुकी थी। राज कपूर का मॉस्को के ऐतिहासिक 'लाल चौराहे' पर नागरिक अभिनंदन किया गया। उसी रात राज कपूर ने नर्गिस से कहा 'आई हैव डन इट' और इसके पहले हर सफलता पर राज कपूर कहते थे 'वी हैव डन इट'। अनजाने में कहे गए एक शब्द ने उनके संबंधों में दरार डाल दी। वर्षों की अंतरंगता पर यह एक शब्द भारी पड़ गया.. 1956 में आई फिल्म 'चोरी चोरी' नरगिस और राजकपूर की जोड़ी वाली अंतिम फिल्म थी। हालांकि राजकपूर  की फिल्म 'जागते रहो' में भी नर्गिस ने अतिथि कलाकार की भूमिका निभाई।
1957 में आई फिल्म मदर इंडिया ने नर्गिस के करियर और जिंदगी को एक नया मोड़ दिया। कई साल पहले फिल्म 'आग' के दौरान उनकी जिंदगी में राज कपूर आए थे। अब 11 साल बाद एक और आग लगी और नरगिस की जिंदगी में आए सुनील दत्त। मदर इंडिया के एक सीन को शूट करते हुए जब नर्गिस आग में फंस गईं तो इससे पहले कि कोई दुर्घटना हो पाती सुनील दत्त भागते हुए आए और आग में कूद पड़े। सुनील दत्त ने न सिर्फ़ नर्गिस की जान बचाई बल्कि उनका दिल भी जीत लिया।शादी से पहले दोनों एक दूसरे को पत्र लिखते थे।ज्यादातर लेटर में सुनील दत्त, नरगिस को पिया कहकर संबोधन करते थे. ज्यादातर पत्रों में सुनील दत्त, नर्गिस को पिया कहकर संबोधन करते थे।आखिर के कुछ पत्रों में दोनों एक दूसरे को डार्लिंगजी लिखकर पत्र भेजना शुरू किया था।साल 1958 में सुनील दत्त ने नर्गिस से शादी कर ली थी. साल 1964 में आई 'यादें' इकलौती फिल्म है जिसमें दोनों को ऑन स्क्रीन रोमांस करने को मिला. इसके बाद नरगिस करीब-करीब फिल्म  इंडस्ट्री को अलविदा कर दिया और लाजवंती, अदालत, यादें, रात और दिन जैसी कुछेक फिल्मों में ही अभिनय किया। उनकी मां उन्हें हमेशा से एक अभिनेत्री बनाना चाहती थीं. कला नर्गिस को विरासत में मिली थी. नर्गिस ने करीब दो दशक के फिल्मी सफर में दर्जनों यादगार भूमिकाएँ की और 1957 में प्रदर्शित फिल्म मदर इंडिया में राधा की भूमिका के जरिये भारतीय नारी का एक नया और सशक्त रूप सामने रखा। इस फिल्म को ऑस्कर के लिए नामित किया गया था। नर्गिस को फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला। रोमांटिक भूमिकाओं को सहज रूप से निभाने वाली नर्गिस ने लीक से हटकर कई भूमिकाएँ की। लाजवंती में नर्गिस ने बलराज साहनी की पत्नी की बेहतरीन भूमिका की और दर्शकों को भावनात्मक रूप से उद्वेलित किया।


नागपंचमी

देश भर में आज नागपंचमी मनाई जा रही है.. हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का यह त्योहार मनाया जाता है.. यह त्यौहार अक्सर हरियाली तीज के दो दिन बाद यानी की सावन महीने के शुक्लपक्ष पंचमी को मन्या जाता है..  ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण त्योहार है... पौराणिक कथा के मुताबिक सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन में नाग को हराकर लोगों का जीवन बचा लिया था.. कृष्ण भगवान ने सांप के फन पर नृत्य किया, जिसके बाद वो नथैया कहलाए.. मान्यताओं के अनुसार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की नागपंचमी के दिन व्रत भी रखा जाता है.. व्रत के बारे में गरुड़ पुराण में लिखा है कि व्रत रखने वाले को अपने घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर गाय के गोबर से नागों के चित्र बनाने चाहिए और मिट्टी या आटे के सांप बनाकर उन्हें अलग-अलग रंगों से सजाना चाहिए.. सजाने के बाद फूल, खीर, दूध, दीप से उनकी पूजा करना चाहिए, क्योंकि नाग देवता को पंचम तिथि का स्वामी माना जाता है.. वैसे तो लोग साँपों को खतरनाक जीव समझते हैं और उनसे भयभीत होते हैं, लेकिन नागपंचमी के दिन लोग नाग देवता की पूजा करते हैं और उन्हें दूध भी अर्पण करते हैं.. इस दिन जमीन खोदने के लिए मनाही है.. इस दिन साँपों को किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचाना पाप समझा जाता है.. इसके अलावा कई प्राचीन काल से जुड़ी कथाएं भी हैं जो नागों और नागपंचमी के महत्त्व को बताती हैं.. ऐसी मान्यता भी है कि नागपंचमी के दिन नागों की पूजा करने पर आध्यात्मिक शक्ति और धन की प्राप्ति होती है.. लेकिन यह बेहद जरूरी होता है कि नागपंचमी के दिन पूजा सही तरीके से ही की जाए.. नागपंचमी की पूजा सुबह-सुबह की जाती है और पूजा से पहले यह जरूरी है कि व्यक्ति नित्यकर्म निपटा कर, अच्छी तरह स्नान करके स्वच्छ कपड़े धारण कर ले.. कई इलाको में नागपंचमी के पिछले दिन का बनाया हुआ बासी भोजन ग्रहण करने की भी प्रथा है..
एक पौराणिक कथा के मुताबिक किसी गांव में एक किसान अपने परिवार के साथ रहता था.. वह दिनभर खेत में काम करता और बाकी समय भगवान का स्मरण करते हुए अपने परिवार के साथ आनंद पूर्वक जीवन बिता रहा था.. उसके परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी थी.. एक बार किसान खेत में हल चला रहा था और अनजाने में उसके हल के नीचे कुचलकर एक नागिन के तीन बच्चे मर गए.. किसान को इस बात का पता नहीं चला और वह रोज की तरह घर आकर खा-पीकर सो गया.. उधर नागिन ने जब अपने बच्चों को मृत पाया, तो पहले वह विलाप करने लगी.. इसके बाद क्रोध में पागल होकर उसने तय किया कि वह किसान के पूरे परिवार को मार डालेगी... ऐसा निश्चय कर वह रात में ही किसान के घर पहुंची और उसे, उसकी पत्नी और दोनों बेटों को डस लिया.. पल भर में ही चारों की मृत्यु हो गई.. किसान की बेटी घर में ना होने से बच गई... किसान की बेटी ने जब अपने परिवार का समूल नाश हुआ देखा, तो वह समझ गई कि कुछ गलत हुआ है.. वह बड़े ही भोले हृदय की मासूम कन्या थी.. उसने नागिन को मनाने का मन बनाया.. वह सुबह पौ फटते ही एक कटोरे में दूध लेकर खेत में पहुंच गई.. जब नागिन ने देखा कि किसान की एक और संतान जीवित है, तो वह उसे काटने दौड़ी.. किसान की बेटी ने झट से दूध का कटोरा उसके सामने रख दिया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई.. नागिन ने जब तक दूध पिया, किसान की बेटी उससे क्षमा मांगती रही और समझाती रही कि सब कुछ उसके पिता से अनजाने में हुआ है.. उन्होंने जान बूझकर नागिन के बच्चों को नहीं मारा है.. उसकी बात से नागिन संतुष्ट हुई और अपना विष वापस लेकर पूरे परिवार को जीवनदान दिया.. तभी से नागों के प्रकोप से बचने के लिए इस दिन नाग पूजा की परंपरा बन गई..
उत्तरप्रदेश में नागपंचमी का त्योहार पर गुड़िया पीटने की बहुत पुरानी परंपरा है... इसके पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं. इस परंपरा के पीछे की कुछ अनोखी कहनियां है.. इसमें से एक कहानी महिलाओं से जुड़ी है... जैसा की हम सभी कहते हैं कि महिलाओं के पेट में बात नहीं पचती. यही कहावत नागपंचमी के दिन गुड़िया पीटने की परंपरा के पीछे भी है... कहा जाता है  तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी... इसके बाद तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या की शादी राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में हुई.... जब वह शादी करके ससुराल आई तो उसने यह राज एक सेविका को बताया और कहा कि वह किसी से न बोले. लेकिन उस सेविका ने इस बात को किसी दुसरे महिला को बता दी. इस तरह से यह बात पूरे नगर में फ़ैल गयी. इस बात से क्रोधित होकर तक्षक के राजा ने नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया. उसे इस बात का गुस्सा था कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती. तभी से गुड़िया पीटने की परंपरा मनाई जाती है. इसके पीछे की दूसरी कहानी भाई-बहन की कहानी से जुड़ी है. भाई भगवान शिव का परम भक्त था और वह प्रतिदिन मंदिर जाता था. मंदिर में उसे एक नागदेवता के दर्शन होते थे. वह लड़का रोजाना उस नाग को दूध पिलाने लगा और धीरे-धीर दोनों में प्रेम हो गया. इसके बाद लड़के को देखते ही सांप अपनी मणि छोड़कर उसके पैरों में लिपट गया... इसी तरह एक दिन सावन के महीने में भाई-बहन मंदिर गए थे. मंदिर में नाग लड़के को देखते ही उसके पैरों से लिपट गया. बहन ने जब देखा तो उसे लगा की नाग उसके भाई को काट रहा है.. तो  लड़की भाई की जान बचाने के लिए नाग को पीट-पीट कर मार डाला. इसके बाद जब भाई ने पूरी कहानी सुनाई तो लड़की रोने लगी. फिर लोगों ने कहा कि नाग देवता का रूप होते हैं... इसलिए दंड तो मिलेगा ...यह गलती से हुआ है ...इसलिए कालांतर में लड़की की जगह गुड़िया को पीटा जाएगा... नागपंचमी के दिन कई परंपराओं का निर्वहन हिन्‍दू सदियों से करते चले आ रहे हैं.. इस दिन पहलवान जहां कुश्‍ती के अखाड़े में जोर-आजमाइश करते हैं वहीं कई स्‍थानों पर विभिन्‍न जानवरों की लड़ाइयां भी कराई जाती हैं.. माना जाता था कि इस दिन जो भी उर्जा उत्पन्न होती है वो मानव जाति के लिए हितकारी होती है.. इसके लिए अखाड़ों की मिट्टी में दूध और दही के साथ हल्दी को भी मिलाया जाता है, जिससे वो मिट्टी शरीर के लिए एक लेप का काम करें और उर्जा उत्पन्न करें लेकिन आधुनिकता के इस दौर में यह चीजे अब लुप्त होती दिखाई पड़ रही हैं.. वहीं गांवों में इस दिन बच्चें गुड्डे-गुड़ियों की शादी भी करते हैं और विधिविधान से इसमें गांव के लोग शामिल होते हैं। 
नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं.. कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी.. उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं.. मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं.. शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं.. यह मंदिर काफी प्राचीन है.. माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था.. इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था.. उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था.. सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए.. लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं... नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के मंदिर के पट खोल दिए जाते हैं.. नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में आरती होता है और मंदिर का पट पुनः बंद कर दिया जाता है... नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है... नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की जाती है.. नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए मंदिर में अलग कतारें होती है.. रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होती है..
नाग पंचमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है.. हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन माह की शुक्ल पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है.. इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है और उन्हें दूध पिलाया जाता है.. और इस दिन अष्टनागों की पूजा की जाती है.. भारत देश कृषि प्रधान देश है.. सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल भी कहते हैं.. जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है.. साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है.. साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए.. भगवान दत्तात्रय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली... साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता.. उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है.. साँप भी प्रभु का सर्जन है, वह यदि नुकसान किए बिना सरलता से जाता हो तो उसे मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है.. जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं... साँप को सुगंध बहुत ही भाती है.. चंपा के पौधे को लिपटकर वह रहता है या तो चंदन के वृक्ष पर वह निवास करता है.. केवड़े के वन में भी वह फिरता रहता है.. उसे सुगंध प्रिय लगती है, इसलिए भारतीय संस्कृति को वह प्रिय है..  सावन के महीने की नागपंचमी पर इस बार बेहद शुभ योग बताया जा रहा है.. अगर आप भी भगवान भोलेनाथ को खुश करना चाहते हैं तो इस नागपंचमी पर विधि विधान से पूजन करें... सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी 27 जुलाई वीरवार को नागपंचमी का त्योहार है.. नागपंचमी सुबह सात बजकर 2 मिनट पर कर्क लग्न में शुरू हो रही है.. सात बजकर 14 मिनट पर कर्क लग्न समाप्त हो रहा है.. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र वीरवार की रात को चार बजकर 39 मिनट पर समाप्त हो रही है.. यह कहना है.. इस वर्ष नागपंचमी का विशेष महत्व और शुभदायक है.. पंचमी तिथि का देवता सर्प है.. राहु सर्प का स्वरूप है.. लग्न का स्वामी चंद्रमा बुध के साथ है.. लग्न में उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का स्वामी मंगल के साथ होने से सर्पयोग बन रहा है.. इस प्रकार के योग में सर्प देवता का पूजन करने से सर्पदंश का भय नहीं रहता.. 27 जुलाई को दोपहर डेढ़ बजे से तीन बजे तक राहु काल है... नागपंचमी पर ऊं नम: शिवाय और महामृत्युंजय मंत्रों का जाप सुबह-शाम करना चाहिए.. वैसे आज प्रात: 7 बजकर 5 मिनट तक भद्रा लगी हुई है, इसलिए इस दौरान पूजा ना करें.. पंचमी तिथि प्रात: 7 बजकर 5 मिनट पर प्रारंभ होगी, जो कि 28 जुलाई को सुबह: 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगी...
  



पशुपतिनाथ

नेपाल की राजधानी है काठमांडू... और काठमांडू में बाबा भोले नाथ पशुपतिनाथ के नाम से विराजमान है... भगवान शिव का यह नगरी विश्व के प्रचीन नगरी में से एक माना जाता है... यह नगर इसलिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि यहां शिव साक्षात विराजमान हैं... भगवान आशुतोष का यह मंदिर विशेष मंदिरों में से एक माना जाता है.... यह मंदिर बागमती नदी के तट पर देवपाटन इलाके में स्थित है.... सदियों से इस मंदिर में भगवान शिव का दर्शन करने के लिए भारत के अलवा पूरी दुनिया से लोग यहां आते हैं....  बाबा भोले नाथ की इस मंदिर से कई अनोखी बातें और रहस्य जुड़े हुए हैं.., जो इसके आकर्षण और महत्व को कई गुना बढ़ा देते हैं... माना जाता है कि भारत में स्थित भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों के अतिरिक्त कुछ ज्योतिर्लिंग बाहर भी हैं, जिसमें पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग एक है. कहते हैं, इस ज्योतिर्लिंग का सम्बन्ध भूगर्भ के माध्यम से उत्तराखंड स्थित केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के साथ जुड़ा हुआ है.... हिन्दू धर्म में यह मंदिर भगवान शिव के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है... पशुपतिनाथ मंदिर के बारे में प्रचलित मान्यता है कि जो व्यक्ति भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन करता है, उसका जन्म फिर कभी पशु योनि में नहीं होता है... लेकिन यहां की एक मान्यता यह भी है.. कि इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते समय श्रद्धालुओं को पहले मंदिर के बाहर स्थित इस नंदी का दर्शन नहीं करना चाहिए... कहते हैं, जो व्यक्ति भगवान शिव से पहले इस नंदी का दर्शन करता है और फिर बाद में भगवान शिव का दर्शन करता है, तो उसे अगले जन्म पशु योनि मिलती है... इसलिए इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन से पहले नंदी का दर्शन करने से मना किया जाता है.... पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य नामक यह एक घाट है. कहा जाता है सिर्फ इस पवित्र घाट का पानी ही मंदिर में ले जाया जाता है... इस घाट के जल के अलावा अन्य किसी जल को मंदिर में लेकर जाने की अनुमति नही है... अपने स्वरुप में पशुपतिनाथ ज्योर्लिंग चारमुखी है... इस ज्योतिर्लिंग के बारे में एक और जनश्रुति यह भी है कि इसमें पारस पत्थर के गुण समाहित हैं.. अर्थात यहां लोहे को सोना में बदला जा सकता है...  इस मंदिर से कई अनोखी बातें और रहस्य जुड़े हुए हैं, जो इसके आकर्षण और महत्व को कई गुना बढ़ा देते हैं...
यह है पशुपतिनाथ का विशाल मंदिर.. इसी मंदिर में विराजमान हैं देवों के देव महादेव.. काठमांडू सहित पूरे नेपाल में भूकंप से सबकुछ तबाह हो चुका था... हजार से ज्यादा मौतें तो सिर्फ काठमांडू में हुई थी... शहर की सारी बुलंद इमारते जमीनदोज हो गईं लेकिन भगवान शिव का यह पशुपतिनाथ मंदिर वैसे हीं खड़ा रहा जैसे ये शिवालय सदियों से यहां अवस्थित है... साल 2015 में काठमांडू में आये भारी भूकंप के बाद भी पशुपतिनाथ मंदिर में खरोंच तक नहीं आया.. यहां तक की आसपास के मंदिरों के गुंबद और दीवारें गिर गई लेकिन पशुपतिनाथ मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ... जब एक तरफ नेपाल में धरती के भीतर से उठी तबाही की तरंगों ने सब कुछ मिटा दिया था,.. पशुपतिनाथ के इस धाम में तब भी गूंज रही थीं इस आफत से राहत की प्रार्थनाएं... त्रासदी के दौरान नेपाल की जमीन पर यही एक ऐसी निशानी है जो तबाही के बीच अब भी सिर उठाए खड़ी है... इस विनाशकारी भूकंप से आधा नेपाल तबाह हो गया है, लेकिन भोले बाबा का मंदिर आज भी वैसा ही है जैसे भूकंप से पहले था.. कहा जाता है की कोई चमत्कार ने मंदिर की रक्षा किया होगा,... नेपाल की पवित्र बागमती नदी के किनारे फैला हुआ है इसका परिसर... पशुपतिनाथ मंदिर का मुख्य ढांचा जो आम मंदिरों से अलग नजर आता है... सोने से सजा शिखर और चांदी के दरवाजे... सीढ़ीनुमा चबूतरा और साथ बहती बागमती नदी... सब कुछ जस का तस था.. श्रद्धालु मानते हैं कि यह शिव का चमत्कार है जिससे भूकंप इस मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचा सका... इस परिसर में आसपास के मंदिरों को तो नुकसान पहुंचा लेकिन पशुपतिनाथ मंदिर का मुख्य ढांचा पूरी तरह सुरक्षित बच गया... 7.9 तीव्रता के भूकंप में काठमांडू के कई एतिहासिक और महत्वपूर्ण इमारतें जमीदोंज हो गई लेकिन पांचवीं सदी के सुप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा.. विनाशकारी भूकंप ने नेपाल को तबाह कर दिया लेकिन कुदरत के विनाशकारी कहर में भी देवों के देव महादेव के मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ.. भूकंप के तेज झटकों से आसपास की इमारतें जमींदोज हो गईं, लेकिन पशुपतिनाथ मंदिर जैसे का तैसे खड़ा है... जिस वक्त तबाही ने ताडंव मचा रहा था.. ठीक उसी वक्त पशुपतिनाथ मंदिर में न जाने कितने भक्त मौजूद थे.. भक्तों का कहना है जलजले से धरती कांपने लगी, लेकिन भोले भंडारी ने अपने भक्तों को नई जिंदगी दे दी... यह कोई पहला मौका नहीं है जब भूकंप से नेपाल में इस तरह की तबाही हुई है, इससे पहले साल 1934 में भी नेपाल में 8.3 की तीव्रता से भूकंप आया था। लगभग 80 साल पहले आए इस भूकंप ने भी नेपाल में खूब तबाही मचाई थी.. कई ऐतिहासिक स्मारक मिट्टी के मलबे में तबदील हो गए थे, लेकिन 1934 में भी पशुपतिनाथ मंदिर को कोई आंच नहीं आई थी... धर्मशास्त्र से जुड़े जानकार मानते है जिस तरह से भारत के उत्तराखंड में आए भयानक सैलाब के बाद केदारनाथ मंदिर को कोई नुकसान नही पहुंचा था, ठीक उसी तरह आधा नेपाल तबाह होने के बाद भी भोले बाबा का पशुपतिनाथ मंदिर पूरी तरह से सुरक्षित है। 
नेपाल में भयानक तस्वीरों के बीच एक चमत्कार का जिक्र हो रहा है. चमत्कार ये कि नेपाल में भूकंप के जिन भयानक झटकों ने 80 फीसदी मंदिरों को तबाह कर दिया उन्हीं झटकों के बीच पशुपतिनाथ का मंदिर पूरी तरह सुरक्षित बच गया. लेकिन ये हुआ क्यों? क्या वाकई चमत्कार हुआ या फिर इसका कोई वैज्ञानिक आधार है ? 
काठमांडु के पशुपतिनाथ मंदिर का शिंवलिग सारे शिंवलिग में सबसे अनोखा माना जाता है  यह भगवान शिव का मंदिर है। इसमें रखा शिवलिंग सबसे अनोखा है। नेपाल राजधानी काठमांडु से 6 किलोमीटर पशुपतिनाथ मंदिर एक बहुत ही विहंगम और विश्वप्रसिद्ध मंदिर है जिसें शिव पुराण के अनुसार एक ज्योतिर्लिग के रूप में निरूपित किया गया है। इस मंदिर के गर्भगृह में चारमुखी 6 फीट ऊंचा विशाल और अनोखा शिवलिंग है।इस शिवलिंग की अनोखी बात ये है कि इसमे बने सभी मुख अपने आप में कुछ न कुछ महत्व लिए हुए हैं और इतना ही नहीं बल्कि इनके नाम भी अलग अलग हैं। इस शिवलिंग पर पूर्व दिशा की ओर बने मुख को "तत्पुरूषा" और दक्षिण को "अघोरा", उत्तर को "वामदेव" तथा पश्चिम दिशा वाले मुख को "साध्योजटा" के नाम से जाना जाता है।पशुपतिनाथ मंदिर स्थित इस शिवलिंग के इन मुखों को चार धर्मो और हिन्दू धर्म के चार वेदों के चिन्हों के रूप में वर्णित किया जाता है। इसके ऊपर के भाग को ईशान कहा जाता है। इस मंदिर में महाशिव रात्रि पर विशेष पूजा-अर्चना होती है जिसमें दुनियाभर के सभी देशों से हिंदू धर्म को मानने वाले लोग यहां आते हैं।
नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर को कुछ मायनों में तमाम मंदिरों में सबसे प्रमुख माना जाता है। पशुपतिका अर्थ है पशु मतलब जीवनऔर पतिमतलब स्वामी या मालिक, यानी जीवन का मालिकया जीवन का देवता। पशुपतिनाथ दरअसल चार चेहरों वाला लिंग हैं। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत कहते हैं। उत्तर दिशा की ओर देख रहा मुख वामवेद है, तो दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोरा कहते हैं।नेपाल अध्यात्म की भूमि है और एक समय में यह जगह पूरी तरह से जिंदगी के आध्यात्मिक पहलुओं से जुड़ी हुई थी। ये चारों चेहरे तंत्र-विद्या के चार बुनियादी सिद्धांत हैं। कुछ लोग ये भी मानते हैं कि चारों वेदों के बुनियादी सिद्धांत भी यहीं से निकले हैं। माना जाता है कि यह लिंग, वेद लिखे जाने से पहले ही स्थापित हो गया था और इससे कई पौराणिक कहानियां भी जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक कहानी इस तरह है- कुरुक्षेत्र की लड़ाई के बाद अपने ही बंधुओं की हत्या करने की वजह से पांडव बेहद दुखी थे। उन्होंने अपने भाइयों और सगे संबंधियों को मारा था। इसे गोत्र वध कहते हैं। उनको अपनी करनी का पछतावा था और वे खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे। खुद को इस दोष से मुक्त कराने के लिए वे शिव की खोज में निकल पड़े। लेकिन शिव नहीं चाहते थे कि जघन्य कांड कुरुक्षेत्र की लड़ाई जो उन्होंने किया है, उससे उनको इतनी आसानी से मुक्ति दे दी जाए। इसलिए पांडवों को अपने पास देखकर उन्होंने एक बैल का रूप धारण कर लिया और वहां से भागने की कोशिश करने लगे। उनका पीछा करके उनको पकड़ने की कोशिश में लग गए। इस भागा दौड़ी के दौरान शिव जमीन में लुप्त हो गए और जब वह पुन: अवतरित हुए, तो उनके शरीर के टुकड़े अलग-अलग जगहों पर बिखर गए। नेपाल के पशुपतिनाथ में उनका मस्तक गिरा था और तभी इस मंदिर को तमाम मंदिरों में सबसे खास माना जाता है। केदारनाथ में बैल का कूबड़ गिरा था। बैल के आगे की दो टांगें तुंगनाथ में गिरीं। यह जगह केदार के रास्ते में पड़ता है। बैल का नाभि वाला हिस्सा हिमालय के भारतीय इलाके में गिरा। इस जगह को मध्य-महेश्वर कहा जाता है। यह एक बहुत ही शक्तिशाली मणिपूरक लिंग है। बैल के सींग जहां गिरे, उस जगह को कल्पनाथ कहते हैं। इस तरह उनके शरीर के अलग-अलग टुकड़े अलग-अलग जगहों पर मिले ।उनके शरीर के टुकड़ों के इस तरह बिखरने का वर्णन कहीं न कहीं सात चक्रों से जुड़ा हुआ है। इन मंदिरों को इंसानी शरीर की तरह बनाया गया था। यह एक महान प्रयोग था- इसमें तांत्रिक संभावनाओं से भरपूर इंसान का एक बड़ा शरीर बनाने की कोशिश की गई थी। पशुपतिनाथ दो शरीरों का सिर है। एक शरीर दक्षिणी दिशा में हिमालय के भारतीय हिस्से की ओर है, दूसरा हिस्सा पश्चिमी दिशा की ओर है, जहां पूरे नेपाल को ही एक शरीर का ढांचा देने की कोशिश की गई थी। नेपाल को पांच चक्रों में बनाया गया था।
नेपाल में भगवान शिव का पशुपतिनाथ मंदिर विश्वभर में विख्यात है। इसका असाधारण महत्त्व भारत के अमरनाथ व केदारनाथ से किसी भी प्रकार कम नहीं है। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में शामिल भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के आठ सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। नेपाल में यह भगवान शिव का सबसे पवित्र मंदिर है। इस अंतर्राष्ट्रीय तीर्थ के दर्शन के लिए भारत के ही नहीं, अपितु विदेशों के भी असंख्य यात्री और पर्यटक काठमांडू पहुंचते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के मुताबिक मंदिर का रिश्ता नित्यानंद नाम के एक ब्राह्मण से है। कहते हैं नित्यानंद की गाय रोज एक ऊंचे टीले पर जाकर स्वयं दूध बहा देती थी। नित्यानंद को भगवान ने सपने में दर्शन दिया। इसके बाद जब उस स्थान की खुदाई की गई तो भव्य लिंग प्राप्त हुआ। एक और कहानी के मुताबिक भगवान आशुतोष सुंदर तपोभूमि से आकर्षित होकर एक बार कैलाश छोड़ कर यहीं आकर रम गए। यहां वो 3 सींग वाले मृग बनकर विचरण करने लगे। इसी वजह से इस इलाके को पशुपति क्षेत्र या मृगस्थली कहते हैं। शिव को गायब देख कर ब्रह्मा और विष्णु को चिंता हुई। खोज करने पर इस इलाके में उनका ध्यान 3 सींग वाले मृग पर गया। ब्रह्मा ने पहचान कर मृग का सींग पकड़ने की कोशिश की, जिससे सींग के 3 टुकड़े हो गए। एक टुकड़ा जहां गिरा शिव की इच्छा से विष्णु ने वहीं शिवलिंग स्थापित किया, जो पशुपतिनाथ के रूप में विख्यात हुआ।कुछ लोग इस मंदिर को पहली शताब्दी का मानते हैं तो इतिहासकार इसे तीसरी शताब्दी का बताते हैं। जो भी हो, मंदिर बहुत प्राचीन है। पशुपतिनाथ का शिवलिंग काले रंग का पत्थर है। कुछ खास धातुओं से बना होने की वजह से इसकी चमक बेमिसाल है। नेपालवासी तो यहां तक मानते हैं कि इस लिंग में पारस पत्थर का गुण है। पशुपतिनाथ नेपाल शासकों के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं। इसमें सबसे पहले राजा और राजवंश के सदस्यों को ही पूजा का अधिकार था। इस मंदिर में केवल हिंदू ही प्रवेश कर सकते हैं। मुख्य द्वार पर नेपाल सरकार का संगीनधारी पहरेदार हर समय रहता है। मंदिर में चमड़े की वस्तुएं ले जाना और फोटो खींचना मना है।बागमती के पवित्र जल से भगवान पशुपति का अभिषेक किया जाता है। इस मंदिर की इतनी मान्यता है कि मोक्ष के लिए बागमती के दाहिनी तट पर गर्भ गृह के सामने ही शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है।


बंटवार

15 अगस्‍त 1947 को एशिया का उपमहाद्वीप कहलाने वाला भारत...  ब्रिटिश हुकूमत से आजाद तो हो गया, लेकिन दो राष्‍ट्र के सिद्धांत पर.. अंग्रेजों ने भारत को आजादी इसी शर्त पर दी कि अखंड भारत खंडित होगा हिंदुस्‍तान और पाकिस्‍तान के रूप में.. भारत का विभाजन माउंटबेटन योजना, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के आधार पर किया गया.. बहरहाल, अंग्रेजों और लॉर्ड माउंटबेटन के लिए भारत और पाकिस्‍तान नक्‍शे पर महज एक लकीर के जरिये अलग हो गया... लेकिन जमीन पर विभाजन की यह रेखा पूरी मानवजाति के इतिहास की एक ऐसी भयावह, रक्‍तरंजित, अमानवीय, क्रूर और जघन्‍य घटना थी कि पूरे दुनिया की मानवता शर्मसार हो गई... दरअसल, भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा महज 50 से 60 दिनों के भीतर लाखों लोगों का विस्‍थापन था, जो विश्‍व में कहीं नहीं हुआ... 10 किलोमीटर लंबी लाइन में लाखों लोग दोनों देश की सीमा को पार हुए.. महज कुछ घंटो के भीतर एक जगह पर सालों से रहने वाले को अपना घर बार, जमीन, दुकानें, जायदाद, संपत्‍ति, खेती किसानी छोडकर हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तान से हिंदुस्‍तान जाना पड़ा.. इतिहास में इतनी ज्‍यादा संख्‍या में लोगों का विस्‍थापन कभी नहीं हुआ.. यह संख्‍या तकरीबन 1 कड़ोर 45 लाख थी... 1951 की विस्थापित जनगणना के मुतबिक विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए... इस विभाजन का जो मुख्य कारण दिया जा रहा था वो था की हिंदू बहुसंख्यक है और आज़ादी के बाद यहां बहुसंख्यक लोग ही सरकार बनायेंगे तब मोहम्मद अली जिन्ना को यह ख़्याल आया कि बहुसंख्यक के राज्य में रहने से अल्पसंख्यक के साथ नाइंसाफ़ी या उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता है तो उन्होंने अलग से मुस्लिम राष्ट्र की मांग शुरू की... भारत के विभाजन की मांग साल दर साल तेज होती गई.. भारत का विभाजन और दो नए राष्ट्रों का निर्माण 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और 15 अगस्त, 1947 को भारत में करने की घोषणा लॉर्ड माउन्टबेटन ने की... इस विभाजन में न केवल भारतीय उप-महाद्वीप के दो टुकड़े किये गये बल्कि बंगाल का भी विभाजन किया गया और बंगाल के पूर्वी हिस्से को भारत से अलग कर पूर्वी पाकिस्तान बना दिया गया। वहीं पंजाब का विभाजन कर पाकिस्तान का निर्माण हुआ.. इस विभाजन में रेलवे, फ़ौज, ऐतिहासिक धरोहर, केंद्रीय राजस्व, सबका बराबरी से बंटवारा किया गया.. भारतीय महाद्वीप के इस विभाजन में जिन मुख्य लोगों ने हिस्सा लिया वो थे मोहम्मद अली जिन्ना, लॉर्ड माउन्ट बेटन, सीरिल रैडक्लिफ़, जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के सदस्य
1920 से 1932 में भारत पाकिस्तान विभाजन की नींव रखी गई.. प्रथम बार मुस्लिम राष्ट्र की मांग अलामा इक़बाल ने 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण में किया था.. 1930 में ही मोहम्मद अली जिन्ना ने सारे अखंड भारत के अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसे में ले लिया और कहा की भारत के मुख्यधारा की पार्टी कांग्रेस मुस्लिम हितों की अनदेखी कर रही है... इसके बाद 1932 से 1942 तक विभाजन की बात बहुत आगे तक निकल गई थी, हालाँकि हिंदूवादी संगठन हिंदू महासभा देश का विभाजन नहीं चाहते थे लेकिन वह हिंदू और मुस्लिम के बिच के फ़र्क़ को बनाये रखना चाहते थे... सन 1937 में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में वीर सावरकर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में भी कहा की भारत एक सजातीय एवं एकजुट राष्ट्र हो सकता है बजाए दो अलग-अलग हिंदू एवं मुस्लिम राष्ट्र के... इन सब कोशिशों के बावजूद भी 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने स्पष्ट कर दिया की उन्हें मुस्लिम राष्ट्र चाहिए और इस मुद्दे पर लीग ने बिना किसी हिचकिचाहट के बोला कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग धर्म है..  अलग रीति-रिवाज और अलग संस्कृति है... ऐसे में दो अलग राष्ट्रों को एकजुट रखना ख़ासकर तब जब एक धर्म अल्पसंख्यक हो और दूसरा धर्म बहुसंख्यक... 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा 'डायरेक्ट एक्शन डे बुलाए जाने पर जो हुआ उस घटना से दोनों समुदाय के नेता घबरा गये थे... इस घटना के कारण उत्तर भारत और ख़ास कर बंगाल में आक्रोश बढ़ गया.. राजनीतिक पार्टियों दोनों राष्ट्र के विभाजन के लिए सोचने लगे... 16 अगस्त 1946 के 'डायरेक्ट एक्शन डे' को “Great kolkata Riot” के नाम से भी जाना जाता है.. 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने आम हड़ताल बुलाई थी जिसमें मुख्य मुददा था 'कांग्रेस कैबिनेट का बहिष्कार' और अपनी अलग राष्ट्र की मांग.. 'डायरेक्ट एक्शन डे' के हड़ताल के दौरान कलकत्ता में दंगा भड़क गया जिसमें मुस्लिम लीग समर्थकों ने हिन्दुओं और सिखों को निशाना बनाया जिसके विरोध में कांग्रेस समर्थकों ने भी मुस्लिम लीग कार्यकर्ताओं के ऊपर हमला बोल दिया.. हिंसा धीरे-धीरे बंगाल से बहार निकल कर बिहार तक फैल गई.. इस दंगे में केवल कलकत्ता में ही 72 घंटे के अन्दर में 4000 लोग मारे गए और क़रीब 1 लाख लोग बेघर हो गए.. इन सब के बाद बहुत से कांग्रेसी नेता भी धर्म के नाम पर भारत विभाजन के विरोध में थे... लेकिन अबतक अंग्रेज़ अपने मकसद में कामयाब हो चुके थे... 'डायरेक्ट एक्शन डे' के हादसे के बाद सबको लगने लगा था कि अब अखंड भारत का विभाजन कर देना चाहिए... दो नए राष्ट्रों का विभाजन माउन्टबेटेन प्लान के अनुसार किया गया.. 18 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा “Indian Independence Act” पास किया गया जिसमें विभाजन की रूप रेखा तैयार की गई.. और अंतत: 1947 में इस ACT को ब्रिटिश संसद ने अधिकारिक तौर पर पारित कर दिया.. जिसके बाद भारत और पाकिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया...
ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर.. वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर... चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तरों की आख़री मंज़िल... कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल.. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ कि ये पंक्तियां उस दिल दहला देने वाली घटना को याद ताजा कर देती है... यकिनन भारत से पाकिस्तान के अलग होने का फैसला दोनों देशों के लिए इतिहास में सबसे ज्यादा दिल तोड़ने वाली घटना है... भारत और पाकिस्तान के बीच हुए विभाजन में कई लोगों की जान चली गयी और अनगिनत लोगो ने अपने परिवार को हमेशा के लिए खो दिया... भारत-पाकिस्तान विभाजन के दुःखों को किताबों फिल्मों नाटकों ने ना सिर्फ महसूस ही नहीं किया बल्कि लोगो के सामने हर बार उस दर्द को ताजा किया है... इसमें कोई दो राय नहीं की भारत-पाकिस्तान का विभाजन दुनिया में सबसे अनोखा विभाजन रहा है क्योकि दोनों देशों ने स्वतंत्रता का जश्न पहले मनाया और विभाजन की घोषणा बाद में हुई... ज्योतिषीयों से ज्योतिषी घटना का ध्यान करते हुए भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक उपयुक्त तारीख लेने का परामर्श किया गया था पर दुर्भाग्य से वह एक शुभ तिथि नही निकाल सके थे जिसके बाद आजादी के लिए 15 अगस्त की आधी रात का निर्णय लिया गया.. 1947 के शुरू में कहा गया था कि दोनों के बीच विभाजन 3 जून 1948 तक किया जायेगा... और साथ ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने कहा था कि ब्रिटेन जून 1948 तक भारत छोड़ कर नही जायेगा.. भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय दोनों देशों के बीच सीमा सिरिल रैडक्लिफ नामक ऐसे शख्स ने तय की थी जो कुछ दिन पहले ही भारत आया था और उसे दोनों देश की भौगोलिक स्थिति का कोई जानकारी नही थी...  हलांकि सीमाओं में बांटने वाले सिरील रेडक्लिफ़ बंटवारे के बाद कभी भारत नही आएं.. भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार के कारण हुआ था पर दोनों देशो को जब विभाजित कर सीमा तय की गयी तब सिरिल रैडक्लिफ धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों से जुड़े किसी भी विचार का ख्याल नही किया था... भारत और पाकिस्तान को बेशक 15 अगस्त और 14 अगस्त को आजादी मिल गयी थी पर दोनों देशो के बीच सीमा की घोषणा 17 अगस्त तक नही हुई थी... पाकिस्तान को 14 अगस्त और भारत को 15 अगस्त को स्वतंत्रता मिल गई,..  दरअसल उस समय हुआ ये था कि माउंटबेटन व्यक्तिगत रूप से भारत और पाकिस्तान स्वतंत्रता समारोह में भाग लेना चाहते थे लेकिन एक ही दिन स्वतंत्रता प्राप्ती होने पर यह संभव नही हो पा रहा था इसलिए 14 अगस्त को पाकिस्तान की स्वतंत्रता के लिए और 15 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता के लिए चुना गया... भारत के राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी बंटवारे के समय दिल्ली में नहीं मौजूद थे.. वह हुसेन शहीद सुहरावर्दी के साथ सांप्रदायिक हत्या को रोकने के लिए कलकत्ता में थे और 15 अगस्त 1947 को उन्होंने दंगाइयों का सामना किया.. महात्मा गाँधी ने आजादी के दिन उपवास कर कताई करते हुए दिन बिताने की कसम खाई थी..
बंटवारे के बाद दोंनो देशों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा वो सरल नहीं था... दोनों देश को सबसे पहले साम्प्रदायिक उन्माद को शान्त करना था.. भारत ने जानबूझकर धर्म निरपेक्ष राज्य बनना पसंद किया... उसने आश्वासन दिया कि जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में रहना पसंद किया है उनको नागरिकता के पूर्ण अधिकार दिए जायेंगे.. हालांकि पाकिस्तान जानबूझकर अपने यहां से हिन्दुओं को निकाल बाहर करने या जिन हिन्दुओं ने वहां रहने का फैसला किया था, उनको एक प्रकार से द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देने की नीति पर चल रहा था... अधिकांश देशी रियासतों ने, जिनके सामने भारत और पाकिस्तान में विलय का प्रस्ताव रखा गया था.. वे भारत में विलय के पक्ष में निर्णय लिया... लेकिन  दो रियासतें कश्मीर और हैदराबाद ने कोई निर्णय नहीं कर पा रहे थे.. जम्मू-कश्मीर उन चंद रियासतों में एक था, जो भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित था और असली फ़ैसला वहीं लिया जाना था... ऐसा लगता है कि अंग्रेज़ों ने यह मान लिया था कि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान में मिलेगा... लेकिन कश्मिर के महाराजा हिंदू थे... बंटवारे और आज़ादी के साथ बढ़े हुए सांप्रदायिक तनाव की वजह से उनके लिए अपने राज्य को मुस्लिम राज्य का हिस्सा बनाना मुश्किल था... भारत में या फिर पाकिस्तान में शामील हो इस पर फ़ैसला करने में हरि सिंह काफ़ी धीमी गति से सोच रहे थे... 15 अगस्त 1947 तक ब्रिटिश और भारतीय अधिकारियों की काफ़ी कोशिशों के बावजूद, हरि सिंह किसी फ़ैसले पर नहीं पंहुच सके थे... उधर पाकिस्तान ने बलपूर्वक कश्मीर की रियासत पर अधिकार करने का प्रयास किया लेकिन अक्टूबर 1947 में कश्मीर के महाराज ने भारत में विलय की घोषणा कर दी... पाकिस्तानी आक्रमणकारियों ने रियासत के उत्तरी भाग पर अपना क़ब्ज़ा बनाये रखा जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया.. भारत ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया और संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिस क्षेत्र पर जिसका क़ब्ज़ा था, उसी के आधार पर युद्ध विराम कर दिया.. जो आज तक इस सवाल का कोई निपटारा नहीं कर सका है.. हैदराबाद के निज़ाम ने अपनी रियासत को स्वतंत्रता का दर्जा दिलाने का षड़यंत्र रचा, परन्तु भारत सरकार की पुलिस कार्रवाई के फलस्वरूप वह 1948 में अपनी रियासत भारत में विलयन करने के लिए मजबूर हो गये.. रियासतों के विलय में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की मुख्य भूमिका रही..

लॉर्ड माउंटबेटेन को स्वाधीन भारत का पहला गवर्नर जनरल बनाये रखा गया और पंडित जवाहर लाल नेहरू और अंतरिम सरकार में उनके कांग्रसी सहयोगियों ने थोड़े से हेरफेर के साथ पहले भारतीय मंत्रिमंडल का निर्माण किया.. इस मंत्रिमंडल में सरदार पटेल तथा मौलाना अबुलकलाम आज़ाद को तो सम्मिलित कर लिया गया था, परन्तु नेताजी के बड़े भाई शरतचंद्र बोस को छोड़ दिया गया... 15 अगस्त 1947 का दिन आ गया भारत आज़ाद हो गया लेकिन इस आज़ादी की खुशी लाहौर मे नहीं थी... लाहौर पाकिस्तान मे गया और गुरुदासपुर और अमृतसर हिंदुस्तान के हिस्से मे आए हिंदुस्तान के साथ पंजाब भी बाँट दिया गया था...  रात मे यही कुछ 11 बजे थे हिन्दुओ के टोले मे से लोगो का एक हुजूम पाकिस्तान मुर्दाबाद जिन्ना मुर्दाबाद के नारे लगाता हुआ मुसलमानो के टोले मे घुस गया और वहा घरो मे आग लगा दी और कई मुसलमानो को मार दिया..  किसी तरह से पुलिस ने दंगे को काबू किया..  दूसरे दिन शाम को ये खबर आई की गुरुदास पुर से एक रेल गाड़ी भर के लाशे आई हैं जिनमे सभी मुसलमान थे...  स्वतंत्रता दिवस के जश्‍न के साथ हर साल एक जख्म भी ताज़ा हो जाता है. वो ज़ख्म था हिंदुस्तान के बंटवारे का. क्या ये बंटवारा रोका नहीं जा सकता था? इस खास पेशकश में आप देखेंगे वो राज, जो अगर खुल जाता तो शायद देश दो टुकड़ों में नहीं बंटता. जो न सिर्फ देश के बंटवारे को रोक सकता था, बल्कि लाखों मासूमों की जिंदगी भी बचा सकता था.जम्मू एवं कश्मीर की रियासत अगस्त 1947 तक किसी भी पक्ष में जाना तय नही कर पाई थी.. पाकिस्तान जम्मू एवं कश्मीर में मुसलमानों की एक बड़ी संख्या होने के कारण अपने पक्ष में करना चाहता था पर हिंदू महाराजा अक्टूबर 1947 के अंत में भारत के साथ शामिल होने के लिए सहमत हो गये...
महात्मा गाँधी ने विभाजन का विरोध करते हुए कहा मुझे विश्वास है कि दोनों धर्म के लोग शांति और सोहार्द बना कर एक साथ रह सकते हैं.. मेरी आत्मा इस बात को अस्वीकार करती है कि हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म दोनों अलग संस्कृति और सिद्धातों का प्रतिनिधित्व करते हैं... मुझे इस तरह के सिद्धांत अपनाने के लिए मेरा भगवान अनुमति नहीं देता पर..
जिन्‍ना की जिद ने पाकिस्‍तान तो बना लिया लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार बाद में जिन्‍ना भी अपने निर्णय पर काफी दु:खी रहते थेकांग्रेस का एक बहुत बड़ा धड़ा पंडित नेहरु के साथ था. यही कारण है कि बंटवारे के मसले पर अधिकांश ने नेहरु का साथ दियासामने मंज़िल थी और पीछे उस की आवाज़ , रुकता तो सफर जाता ,चलता तो बिछड़ जाता कुछ ऐसे ही हालात थे.. ऐसा दुनिया के इतिहास कभी नहीं देखा होगा कि जिस आजादी के लिए आप लड़े हो और वो आपको मिल जाए तो आप खुश ना हो.. भारत और पाकिस्तान की साझा इतिहास में गांधी वो शख्स थे जो अगस्त के उस हफ्ते में दुखी थे.. उन जैसे कई हजारों और भी लोग थे जो कह रहे थे कि अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई इस बंटवारे और दंगे को देखने के लिए तो नहीं लड़ी थी..पर्दे के पीछे की साजिशें.. देश को पाने का खुशी और बटवारे का गम.. बहुत कुछ ऐसा है बारत और पाकिस्तान के बंटवारे में जिसे त्रासदी कहा जा सकता है.. लेकिन बारत और पाकिस्तान में क्या कुछ हो रहा था कौन क्या कर रहा था यही सब जानने की