रविवार, 2 दिसंबर 2018

हरदिल अजिज एस डी बर्मन


हरदिल अजिज एस डी बर्मन
हिंदी और बांग्ला फिल्मों में अपनी खास पहचान रखने वाले सचिन देव बर्मन ऐसे संगीतकार थे जिनके गीतों में लोकधुनों, शास्त्रीय और रवीन्द्र संगीत का स्पर्श था...वहीं वेस्टर्न म्यूज़िक का भी शानदार कॉम्बीनेशन था...सचिन देव बर्मन का जन्म 1 अक्टूबर 1906 में हुआ था....प्यार से लोग उन्हें एस डी बर्मन बुलाते थे...बर्मन साहब ने अस्सी से भी ज़्यादा फ़िल्मों में संगीत दिया था...चुपके-चुपके का मशहूर रोमांटिक गाना, ‘अब के सजन सावन में’, एसडी बर्मन ने 31 अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को अलविदा कहने से कुछ समय पहले ही बनाया था... एसडी बर्मन एक ऐसे विरले संगीतकार थे जो अपने आखिरी वक्त तक न सिर्फ काम करते रहे बल्कि दिल से युवा भी रहे... इसी तरह अभिमान का हिट गीत, ‘मीत ना मिला रे मन काबनाते वक़्त बर्मन साहब की उम्र 67 साल थी...1971 में जब आरडी बर्मन रैना बीती जाएके साथ सफलता की सीढियां चढ़ रहे थे, तो इसी साल एसडी बर्मन मेघा छाये आधी रातजैसे गीत की रचना कर रहे थे... एसडी बर्मन की म्यूज़िकल जर्नी की शुरुआत फिल्म बाज़ी से की जानी चाहिए... हालांकि इसके पहले भी वे सफल संगीत की रचना कर चुके थे...लेकिन बाज़ी में गीता दत्त का गाया हुआ, ‘तदबीर से बिगड़ी हुयी तक़दीरऔर सुनो गज़र क्या गाएने न सिर्फ एसडी बर्मन को ऊंचाइयां दीं बल्कि गीता दत्त को भी एक नयी और मॉर्डनगायिका रूप में पहचान दिलाई... वहीं लता मंगेशकर के साथ आया गाना झन झन झन झन पायल बाजेखूब चर्चित हुआ...1955 में उन्होंने किशोर कुमार से जीवन के सफ़र में राहीगवाया तो इसी फिल्म में हेमंतकुमार और गीता दत्त से युगल गीत दिल की उमंगें हैं जवांगवाया...इसी साल आई फिल्म देवदास में उन्होंने तलत महमूद से मितवा लागी रे ये कैसीगाने को आवाज़ दिलवाई... फिल्म प्यासा में ओपी नैय्यर और एसडी बर्मन की जोड़ी ने शानदार संगीत दिया...वही सुजाता में अपने संगीत से एक अछूत कन्या के दर्द को आवाज़ दी...1960 में आई कागज़ के फूल में वक़्त ने किया क्या हंसी सितमऔर देखी ज़माने की यारीजैसे गीतों को अपना संगीत दिया...लता मंगेशकर और बर्मन दा की जोड़ी बेमिसाल रही...फिल्म बंदिनी में दोनों ने कमाल कर दिया...मोरा गोरा अंग लै लेऔर जोगी जब से तू आया मेरे द्वारजैसे गीत हर जुबान पर छा गए... इसी फिल्म में बर्मन दा का खुद का गाया मोरे साजन हैं उस पारभी था... एस डी बर्मन औऱ देवआनंद का साथ भी खूब रहा...फिल्म गाइड तक बर्मन दा देव आनंनद की 12 फिल्मों में म्यूज़िक दे चुके थे...और फिल्म गाइड के गाने सुपर हिट रहे...इसके बाद कुछ दिन वो संगीत से दूर रहे और जल्द ही तलाश ,गैम्बलर और शर्मीली के संगीत के साथ बर्मन दा फिर खूंटा गाड़ चुके थे...इसके बाद 1973 में आई अभिमान के सभी सात गाने सुपर हिट हुए...मीत ना मिला रे मन कासे लेकर पिया बिना पिया बिनातक इसमें संगीत के सभी रंग थे...इसके साथ ही उन्हें 20 साल बाद फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला... 1975 में फिल्म मिली के एक गाने की रिहर्सल चल रही थी... इसी दौरान एसडी बर्मन की तबीयत बिगड़नी शुरू हुई जिसके बाद वे कोमा में चले गए और फिर कभी होश में नहीं लौटे.... यह गाना था - बड़ी सूनी-सूनी है जिंदगी ये जिंदगी’.... किशोर कुमार के गाए इस गीत में आज भी संगीत प्रेमी बर्मन दा के बिछड़ने का दर्द महसूस कर सकते हैं...


मशहूर गायिका आशा


मशहूर गायिका आशा
आशा भोसले, आशा ताई, आशा जी, ऐसे कई सारे नाम हैं जो प्यार से आशा भोसले को दिए गए हैं, 1000 से ज्यादा फिल्मों में 20 भाषाओं में 12000 से भी ज्यादा गीत गा चुकी आशा भोसले की आवाज पर उम्र का असर अब जरूर दिखने लगा है. लेकिन मिठास वैसी ही है, जिंदादिली वैसी ही है. दरअसल, वो जिंदगी की आशा हैं. अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी. उन्होंने बहुत मुश्किलें झेली हैं. हर मुश्किलों ने उन्हें और मजबूत ही किया... आशा भोसले का जन्म 8 सितम्बर 1933 को ब्रिटिश इंडिया के सांगली स्टेट में हुआ था. और उन्होंने 10 साल की उम्र में ही गाना शुरू कर दिया था...  आशा भोसले मशहूर थिएटर एक्टर और क्लासिकल सिंगर 'दीनानाथ मंगेशकर' की बेटी और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर की छोटी बहन हैं...  जब आशा ताई महज 9 साल की थीं तब उनके पिता का देहांत हो गया था जिसकी वजह से अपनी बहन लता मंगेशकर के साथ मिलकर उन्होंने परिवार के सपोर्ट के लिए सिंगिंग और एक्टिंग शुरू कर दी थी... आशा जी ने 1943 की मराठी फिल्म 'माझा बल' में पहला गीत 'चला चला नव बाला' गाया था...  हिंदी फिल्मों में आशा ताई ने 1948 में हंसराज बहल की फिल्म 'चुनरिया' में पहला गीत 'सावन आया' गाया था....  मात्र 16 साल की उम्र में आशा जी ने 31 साल के गणपतराव भोसले से घर वालों के विरुद्ध जाकर भागकर शादी कर ली थी लेकिन ससुराल में माहौल सही ना होने पर पति और ससुराल को छोड़कर अपने दो बच्चों के साथ मायके चली आई थी और फिर से सिंगिंग शुरू कर दी थी...  उस जमाने में जब गीता दत्त, शमशाद बेगम और लता मंगेशकर का नाम हर तरफ हुआ करता था, आशा भोसले को वो गीत दिए जाते थे जिन्हे ये तीनो गायक छोड़ दिया करते थे. यही कारण है कि 50 के दशक में वैम्प्स, बैड गर्ल्स या सेकंड ग्रेड की फिल्मों में ज्यादातर आशा ताई गीत गाया करती थी...  फिल्म मेकर बिमल रॉय ने 1953 की फिल्म 'परिणीता' में उन्हें गाने का मौका दिया था, वहीं राज कपूर ने भी 1954 की फिल्म बूट पॉलिश में आशा जी को मोहम्मद रफी के साथ गीत गाने का अवसर दिया था...  बी आर चोपड़ा की 1957 में आई हुई फिल्म 'नया दौर' ने आशा ताई' को अव्वल दर्जे की सिंगर का दर्जा दे दिया जब उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ 'मांग के साथ तुम्हारा', 'उड़ें जब जब जुल्फें' और 'साथी हाथ बढ़ाना' जैसे गीतों को अपनी आवाज दी...  मशहूर एक्ट्रेस हेलेन के लिए आशा ताई ने कई सारे गीत जैसे 'पिया तू अब तो आज और 'ये मेरा दिल' जैसे हिट गाने गाए...  फिल्म 'तीसरी मंजिल' के गीत 'आजा आजा' के लिए आशा ताई ने 10 दिन की रिहर्सल की और उसके बाद पंचम दा के लिए गाना गाया... आशा ताई को 'पॉप क्रूनर' और 'कैबरे सिंगर' का खिताब दिया गया था लेकिन उन्होंने 'उमराव जान' फिल्म में रेखा पर फिल्माई गई गजलों जैसे 'इन आंखों की मस्ती के', 'दिल चीज क्या है' को गाकर बता दिया कि वह एक गजब की वर्सेटाईल सिंगर हैं...  आशा जी ने ओ पी नय्यर, खय्याम, रवि, सचिन देव बर्मन, राहुल देव बर्मन, इल्लिया राजा, ए. आर रहमान, जयदेव, शंकर जयकिशन, अनु मलिक, मदन मोहन जैसे मशहूर संगीतकारों के लिए भी अपनी आवाज दी है.... आशा जी ने 1980 में आर डी बर्मन के साथ शादी की, यह आशा भोसले और पंचम दोनों के लिए दूसरी शादी थी. शादी के वक्त पंचम दा, आशा ताई से 6 साल छोटे थे... आशा भोसले को 7 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड , 2 बार नेशनल अवॉर्ड, पद्म विभूषण और दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है. 1997 में आशा भोसले पहली भारतीय सिंगर बनी जिन्हे ग्रैमी अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट किया गया था.... आशा जी ने अपने इंटरव्यू में कई बार बताया है कि वो पंचम दा से झगड़ा करती थीं कि उन्हें शास्त्रीय संगीत वाले गाने क्यों नहीं दिए जाते. सारे सुरीले गाने लता मंगेशकर को मिलते हैं. उनके हिस्से आड़े-तिरछे गाने आते हैं. इस पर पंचम का जवाब था कि वो गाने तुम्हीं गा सकती हो, इसलिए मैं वो बनाता हूं. फिर वो दिन आया, जब पंचम दुनिया छोड़ गए. आशा जी ने संघर्ष भरी जिंदगी में एक और मुश्किल मोड़ देखा. वो टूट गईं. लेकिन उन्होंने हमेशा की तरह वापसी की. आशा जी कहती हैं कि पिता की मौत के बाद ये उनकी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर था... उसके बाद भी उन्होंने अपने करीबियों की मौत देखी है. वो दर्द झेला है. लेकिन हर बार जब आशा जी किसी पब्लिक फंक्शन में आती हैं, तो उन्हें देखकर खुशनुमा अहसास होता है. वो वाकई संगीत के लिए आशा हैं. विद्रोह के लिए आशा हैं. जिंदगी के लिए आशा हैं.

चुलबुली एक्ट्रेस काजोल


एक चुलबुली एक्ट्रेस काजोल
बॉलीवुड की चुलबुली एक्ट्रेस में शुमार एक ऐसी एक्ट्रेस ने बॉलीवुड में 25 साल पूरे कर लिए हैं... जिसने कभी सिमरन तो कभी अंजली बनकर ऑडियंस का दिल जीतने में कामयाब रही... जी हां हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड की टॉप एक्ट्रेसेस में शुमार काजोल की...काजोल ने फिल्म इंडस्ट्री में अपने 25 साल पूरे कर लिए हैं...काजोल ने फिल्म बेखुदी से बॉलीवुड में डेब्यू किया था...जिसमें उनके साथ एक्टर कमल सरदाना ने लीड रोल प्ले किया था...25 साल पूरे होने के मौके पर काजोल ने ट्विटर पर अपनी एक पुरानी तस्वीर शेयर की है.... जिसमें वो अपनी मां तनुजा और शोमू मुखर्जी के साथ दिख रही हैं..काजोल ने तस्वीर के कैप्शन में लिखा ‘25 साल पुराना समय..इतने समय तक इतना प्यार मिला। मैं खुशनसीब हूं...खास बात ये है कि डायरेक्टर राहुल रवैल फिल्म बेखुदी में तनुजा ने भी काम किया था...तनुजा ने काजोल की मां का ही किरदार निभाया था...काजोल ने भले ही फिल्म बेखुदी से डेब्यी किया था लेकिन उन्हेंन पहचान मिली फिल्म बाजीगर से...जिसके बाद काजोल ने कबी पीछे मुड़कर नहीं देखा...काजोल ने हर तरह के किरदार को पर्दे पर पेश किया...और अपने अब तक के करियर में एक से भड़कर एक हिट फिल्में दी...भला कौन भूल सकता है फिल्म दिलवाले दुल्हनिया की सिमरन को कौन भूल सकता है कभी खुशी कभी गम की अंजली को...जो वास्क को गमला कह कर सबी को अपना दीवाना बना लेती है...बॉलीवुड में काजोल एक चुलुली एक्ट्रेस  के तौर पर जानी जाती है...और ये चुलवुलापन उनकी फिल्मों में साफ दिखा देता है...फिल्म कुछ कुछ होता है में जहां वो टॉम ब्याए बनी नजर आई तो वहीं फिल्म के सैकेंड हाफ में साड़ी में बेहद खूबसूरत नजर आईं...रोमांटिक फिल्में के अलावा काजोल ने गुप्त जैसी निगेटिव शेड्स वाली फिल्म भी की...ये पहली ऐसी फिल्म थी जिसमें एक्ट्रेस  निगेटिव किरदार में नजर आई थी...और इस फिल्म में काजोल की एक्टिंग को ना सिर्फ ऑडियंस बल्कि क्रिटिक्स नने भी काफी पसंद किया और काजोल को बेस्ट निगेटिव रोल के लिए फिल्म फेयर अवॉरे्ड  भी मिला...वहीं फिल्म दुश्मन में काजोल ने डबल रोल को बेहद खूबसूरती को साथ पेश किया...दोनों ही किरादीरों में उन्होंने अपनी एक्टिंग का जलवा दिखाया...काजोल उन एक्ट्रेस में शुमार हैं जिन्होंने बॉलीवुड के सभी बड़े एक्टर्स के साथ काम किया...फिल्म प्यार किया तो डारना में काजोल सलमान खान के साथ नजर आई तो फिल्म ये दिल्लगी में उन्होंने अश्र्य के साथ काम किया...फिल्म हमेशा में काजोल और सैफ अली खान की जोड़ी नजर आई...तो वहीं पति अजय देवगन के साथ भी प्यार तो होना ही था जैसी सुपरहिट फिल्म दी...बॉलीवुड में काजोल की जोड़ी शाहरुख खान के साथ हिट हुई और दोनों ने मिलकर डीडीएलजी. कभी खुशी कभी गम, कुछ कुछ होता है, माइनेम इज खान, करण अर्जुन बाजीगर और दिलवाले जैसी सुपरहिट फिल्में दी...आज भी फैंस शाहरुख काजोल को पर्दे पर देखना पसंद करते हैं...शादी के बाद काजोल ने फिल्म फना से फिल्मों में कमबैक किया...जिसमें पहली बार आमिर खान के साथ उनकी जोड़ी दिखाई दी...ये फिल्म सुपरहिट रही और एक बार फिर से काजोल ने अपनी शानदार एक्टिंग का जलवा दिखाया...वहीं हाल ही में काजोल  फिल्म हैलीकॉप्टर ईला कॉप्टर इला में नजर आईं थी...जिसमे उन्होंने एक सिंगल मदर का रोल प्ले किया था...बात उनकी काजोल की अपकमिंग फिल्म की करें तो जल्द ही काजोल एक बार फिर से पति अजय देवगृन के फिल्म ताना जी में दिखाई देंगी...25 होने के मौक पर हम तो बस यही विश करते हैं कि काजोल अपने फैसं को ऐसे ही एंटरटेन करती रहें।

जुबली स्टार राजेन्द्र कुमार


जुबली स्टार राजेन्द्र कुमार
हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं.. कोई तुझ-सा नहीं हज़ारों में फिल्म घराने के ये गीत हिन्दी सिनेमा के जुबली स्टार राजेन्द्र कुमार पर फिट बैठता है..  हिन्दी सिनेमा में ऐसे कई महान कलाकार हुए जिन्होंने सिनेमा जगत को खुशी के कई पल दिए… इन्हीं बेहतरीन कलाकारों में से एक हैं राजेन्द्र कुमार… जिनका आज पुण्यतिथि है... कहते हैं दिलीप कुमार जब अभिनय के सरदार और ट्रेजडी किंग थे तो राजेन्द्र कुमार जुबली स्टार... दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर की तिकड़ी के दौर में राजेंद्र कुमार एक ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने न सिर्फ अपना अलग मुकाम बनाया बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी कामयाबी की नई इबारत लिखी… जुबली कुमार के नाम से मशहूर राजेंद्र कुमार बॉक्स ऑफिस की नब्ज को बखूबी समझते थे. उन्हें पता होता था कि दर्शकों को किस तरह की फिल्म पसंद आएगी और किस तरह की फिल्म उन्हें पसंद नहीं आएगी… राजेन्द्र कुमार का जन्म 20 जुलाई, 1929 को सियालकोट में हुआ था. उनकी शक्ल-सूरत बेशक खास नहीं थी लेकिन मेहनत और लगन बदौलत राजेन्द्र कुमार ने फिल्म जगत में बिना किसी मदद के दर्शकों के हरदिल अजिज हो गये.. यह उनकी खुशनसीबी के साथ-साथ काबिलियत भी थी कि उन्हें पहली ही फिल्म में हिंदी सिनेमा के पहले महानायक दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला. फिल्म का नाम जोगनथा. इसमें उनके साथ नरगिस भी थीं...  राजेन्द्र कुमार ने 1950 और 60 के दशक में कई हिट फिल्में दी. एक वक्त ऐसा भी था जब 1963 से 1966 के बीच उनकी 6 फिल्मों ने लगातार जुबली मनाकर रिकॉर्ड बना दिया था.. इसमें मेरे महबूब’, ‘जिंदगी’,’संगम’,’आई मिलन की बेला आरजूऔर सूरजशामिल हैं.. साल 1960 से 1970 के बीच जुबली कुमार की जिंदगी का गोल्डन पीरियड था.. लेकिन जैसे-जैसे राजेश खन्ना ऊपर चढ़ते गए, राजेंद्र कुमार का सूरज ढलता गया.. राजेन्द्र कुमार को फिल्मफेयर पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में तीन बार नामांकन मिला.. हालांकि उन्हें कभी यह पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वह दौर कई महान अभिनेताओं का था, जो कुछ मामलों में उनसे बीस नजर आए. मसलन दिलीप कुमार ट्रेजडी किंग थे तो देवानांद रोमांस के किंग थे... लेकिन राजेन्द्र कुमार को जनता ने हमेशा अपना पुरस्कार और सम्मान दिया. उनकी फिल्मों को इस कदर कामयाबी मिली कि उन्हें जुबली कुमार का नाम दिया गया. इस सफलता के बावजूद कुमार के पांव हमेशा जमीन पर रहे. वह निजी जिंदगी में बहुत ही सुलझे हुए इंसान थे... राजेन्द्र कुमार को साल 1969 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. जीवन के आखिरी दिनों में वह कैंसर की चपेट में आ गए और 12 जुलाई, 1999 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।



शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

नवरात्रि के नौ रंग


नवरात्रि के नौ रंग
आज से नवरात्रि का शुभारंभ हो चुका है... और इसी के साथ घर घर में शुरू हो गई है देवी के अलग-अलग रूपों की उपासना... नवरात्र के पहले दिन घरों में कलश स्थापना के साथ ही मां के आगमन को लेकर विशेष तैयारियां की गई है... नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम रूप श्री शैलपुत्री का पूजन किया जाता है...  मान्यता है कि नवरात्र के पहले दिन माता शैलपुत्री के दर्शन से भक्तों की हर मुराद पूरी होती है. वैवाहिक बाधा हो या पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा, मां अपने दर पर आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी करती हैं.... मां शैलपुत्री की आराधना से मनोवांछित फल और कन्याओं को उत्तम वर की प्राप्ति होती है... नवरात्र के पहले दिन मां भगवती की पूजा समस्त मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती हैं... लेकिन अगर सही मुहूर्त में कुछ खास विधि-विधान के साथ मां के मंत्रों का जाप कर लिया जाए तो देवी नौ इच्छाओं के पूरा होने का वर दे देती हैं.... घर में लक्ष्मी स्थायी वास हो जाता है और बेरोजगारों को नौकरी मिल जाती है. जो लोग संतान की खुशियों से वंचित हैं,  उनका घर आंगन चहक उठता है.... और रोगियों को मिलता है निरोगी काया का आशीर्वाद. यही नहीं व्यापार में आने वाली अड़चनें भी मां के आशीर्वाद से दूर हो जाती हैं... नौ दिनों तक चलने वाला शक्ति की आराधना का पर्व आज से शुरू हो गया... इन नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाएगी... नवरात्र के पहले दिन देवी के शैली पुत्री रूप की पूजा होती है. सुबह से ही देश के प्रमुख मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है... क्योंकि भक्तों के द्वार पर मां की दस्तक से खुलने वाला है खुशियों का द्वार... और शक्ति की भक्ति में डूब गया है पूरा संसार....  मां का नाम और जयकारे के जरिए भक्त मां तक पहुंचा रहे हैं... कहते हैं पहले दिन की पूजा से मां के नौ रूपों का आशीर्वाद मिल जाता है...  और देवी अपने भक्तों को हर मुश्किल से उबार लेती हैं... मां शैलपुत्री के दिव्य स्वरुप पर गौर करें तो उनके एक हाथ में त्रिशूल है और दूसरे हाथ में कमल... मां की सवारी वृषभ की है. माता के दर्शन को आया हर भक्त उनके दिव्य रूप के रंग में रंग जाता है... मां शैलपुत्री को लेकर कहा जाता है कि मां पार्वती ने हिमवान की पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री कहलाईं. माता एक बार किसी बात पर भगवान शिव से नाराज होकर कैलाश से काशी आ गईं और जब भोलेनाथ उन्हें मनाने आए तो उन्होंने महादेव से आग्रह किया कि यह स्थान उन्हें बेहद प्रिय लगा. तभी से माता अपने दिव्य रूप में बनारस में विराजमान हैं... पंडितों का कहना है कि अगर पहले ही दिन मां की विधि विधान से पूजा कर कुछ मंत्रों का जाप कर लिया जाए, तो घर में निश्चित रूप से समृद्धि का वास हो जाता है...
माता चंद्रघंटा
मां दुर्गा की महाउपासना की नवरात्रि में हर दिन मां के अलग-अलग स्वरूपों की साधना की जाती है और मां के हर रूप की अलग महिमा भी है. नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है... मां चंद्रघंटा देवी मां दुर्गा की तीसरी शक्ति हैं. इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इस कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है. चंद्रघंटा देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है... आज नवरात्रि का दूसरा दिन है.. इस बार दुनिया भर में नवरात्रि के दूसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जा रही है... नवरात्र का तीसरा दिन भय से मुक्ति और अपार साहस प्राप्त करने का दिन होता है... इस दिन मां के चंद्रघंटा स्वरुप की उपासना की जाती है... नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के 9 रूपों की पूजा की जाती है... और माता के सभी 9 रूपों को पाप विनाशिनी भी कहा जाता है... आज मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है... माता चंद्रघंटा के सिर पर घंटे के आकार का चंद्रामा है, इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है... देवी चंद्रघंटा का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है. उनका ध्यान हमारे इस लोक और परलोक दोनों को सद्गति देने वाला है...  इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है इसीलिए मां को चंद्रघंटा कहा गया है. इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है और इनके दस हाथ हैं. वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं. सिंह पर सवार दुष्‍टों के संहार के लिए हमेशा तैयार रहती हैं. माता के पूजा के दौरान घंटे की भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस कांपते रहते हैं... नवरात्रि में तीसरे दिन चंद्रघंटा देवी की पूजा का काफी महत्व है... कहा जाता है चंद्रघंटा देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है.. देवी चंद्रघंटा की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं... दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं... मां चंद्रघंटा की पूजा करने से घर में शांति आती है और परिवार का कल्याण होता है. मां को लाल रंग पसंद है.. इसिलिए मां चंद्रघंटा को भक्त लाल फूल.. लाल फल और गुड़ अर्पित करते हैं.... पूजा के दौरान माता के भक्त घंटा बजाकर माता को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं.. पुराणों के मुताबिक ढोल और नगाड़े बजाकर मा चंद्रघंटा की पूजा और आरती करने से शुत्रुओं की हार होती है... इस दिन गाय के दूध का प्रसाद चढ़ाने का विशेष विधान है. इससे हर तरह के दुखों से मुक्ति मिलती है.... नवरात्र के दिनों में वैसे तो मां दुर्गा की कृपा बड़ी ही आसानी से मिल जाती है लेकिन मां को खुश करने के लिए उनके हर स्‍वरूप की पूजा करने की विधि अलग हैं. मां चंद्रघंटा की उपासना करने से भय का नाश होता है और साहस की प्राप्ति होती है. शत्रुओं का नाश करने के लिए मां का आशीर्वाद बहुत जरूरी होता है और इसके लिए मां के मंत्र का जाप करना बहुत कल्‍याणकारी माना गया है...
माता कुष्मांडा
दुखों को हरने वाली.. दुश्मनों का नाश करने वाली.. यश, बल और बुद्धि प्रदान करने वाली माता कुष्मांडा देवी का आज दिन हैं.. कहा जाता है कि सीता को बचाने के लिए राम ने रावण के ऊपर आक्रमण करने से पहले माता कुष्मांडा की पूजा की थी.. वैसे नवरात्रों में मां भगवती के नौ अलग अलग रुपों की पूजा की जाती है... मां भगवती को शक्ति कहा गया है... नवरात्रों के बारे में मान्यता है कि देवता भी इन दिनों में मां भगवती की पूजा किया करते है... नवरात्रि में हर दिन देवी के अलग अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है. कुष्मांडा देवी की आराधना नवरात्रि के चौथे दिन होती है. इस बार नवरात्रि के पहले दिन प्रतिपदा और द्वितीया होने की वजह से कुष्मांडा देवी की आराधना तीसरे दिन की जा रही है... अपनी हल्की हंसी से ब्रह्रांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा हुआ... मां की आठ भुजाएं हैं इसलिए ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं...  देवी की आठ भुजाएं हैं. इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र, गदा और जप माला हैं. देवी का वाहन सिंह है... पुराणों के मुताबिक शांत-संयत होकर, भक्‍ति-भाव से माता की पूजा करनी चाहिए. इनकी उपासना से भक्तों को सभी सिद्धियां और निधियां मिलती हैं और लोग नीरोग होते हैं.. इस दिन माता को मालपुआ का प्रसाद चढ़ाना चाहिए. इससे बुद्धि का विकास होता है.... चौथे स्वरूप में देवी कुष्मांडा भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं...  माता कुष्मांडा बाघ की सवारी करती हुईं अष्टभुजाधारी, मस्तक पर रत्नजडित स्वर्ण मुकुट पहने उज्जवल स्वरूप वाली दुर्गा हैं... अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कुष्मांडा पड़ा... कहा जाता है कि जब दुनिया नहीं थी, तो चारों तरफ सिर्फ अंधकार था. ऐसे में देवी ने अपनी हल्की-सी हंसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की... चतुर्थी के दिन अगर किसी व्यक्ति को अपना शनि शान्ति कराना हो तो यह दिन उनके लिए अच्छा है और ऐसा करके वे लोग शनि के अशुभ प्रभाव से बच सकते हैं. माता कुष्माण्डा की पूजा करने के बाद माता को इस दिन तरह तरह के पकवान से भोग लगाया जाता है.

मां स्कंदमाता

नवरात्र के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की उपासना की जाती है. स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम किया गया है. भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं... स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं जिनमें से माता ने अपने दो हाथों में कमल का फूल पकड़ा हुआ है. उनकी एक भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है जिससे वह भक्तों को आशीर्वाद देती हैं और एक हाथ से उन्होंने गोद में बैठे अपने पुत्र स्कंद को पकड़ा हुआ है. ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं. इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है. पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता का वाहन सिंह है... शास्त्रों में मां स्कंदमाता की आराधना का काफी महत्व बताया गया है... पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और भक्त को मोक्ष मिलता है. सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाता है. अतः मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले साधक या भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है... कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति मना जाता है और माता को अपने पुत्र स्कंद से अत्यधिक प्रेम है... जब धरती पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ता है तो माता अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का नाश करती हैं... स्कंदमाता को अपना नाम अपने पुत्र के साथ जोड़ना बहुत अच्छा लगता है. इसलिए इन्हें स्नेह और ममता की देवी माना जाता है.. पंचमी तिथि के दिन पूजा करके भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए. ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है... कहा भी जाता है पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं स्कंदमाता की पूजा-अर्चना करने से माता की कृपा हमेशा बनी रहती है.. इन्हें मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता के रूप में जाना जाता है। इनके चार हाथ हैं, गोद में बालरूप भगवान स्कंद विराजमान होते हैं। शेर पर सवार होकर माता दुर्गा अपने पांचवें स्वरुप स्कन्दमाता के रुप में भक्तजनों के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। स्कंदमाता को केला बहुत प्रिय है। इन्हे प्रसन्न करने के लिए खीर में केसर डालकर भोग लगाना चाहिए। माना जाता है स्कंदमाता की उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। साथ ही जिनके संतान नहीं है उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।

माता कालरात्रि
वो शक्ति स्वरूपा हैं.. वो दुष्टों के लिए काल है.. और मां कालरात्रि भक्तों के लिए ढाल हैं.. इनका रूप भयंकर है.. देवी भगवती का यह सातवां स्वरूप अनंत है... व्यापक है... संसार में व्याप्त दुष्टों और पापियों के हृदय में भय को जन्म देने वाली मां हैं मां कालरात्रि... मां काली शक्ति सम्प्रदाय की प्रमुख देवी हैं. इन्हें दुष्टों के संहार की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है... कालरात्रि अर्थात् काल को जीतने वाली... मां कालरात्रि की खास पहचान है कि उनका रूप देखकर ही दुष्टों की रूह कांप जाती है... देवी कालरात्रि का शरीर रात के अंधकार की तरह काला है इनके बाल बिखरे हुए हैं और इनके गले में विधुत की माला है. इनके चार हाथ हैं जिसमें इन्होंने एक हाथ में कटार और एक हाथ में लोहे का कांटा धारण किया हुआ है... इसके अलावा इनके दो हाथ वरमुद्रा और अभय मुद्रा में है... इनके तीन नेत्र है और इनके श्वास से अग्नि निकलती है.... गधा, मां कालरात्रि की सवारी है.... दुर्गा जी का सातवां स्वरूप मां कालरात्रि का रंग काला होने के कारण ही इन्हें कालरात्रि कहा गया और असुरों के राजा रक्तबीज का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने अपने तेज से इन्हें उत्पन्न किया था....  मां कालरात्रि की पूजा शुभ फलदायी होने के कारण इन्हें 'शुभंकारी' भी कहते हैं... पुराणों के मुताबिक असुरों के राजा रक्तबीज का वध करने के लिए देवी दुर्गा ने कालरात्रि का अवतार लिया था... मां काली निरंतर संहार करती हुई विनाशलीला रच रही थीं.... इनके भयंकर स्वरूप और उत्पात से सृष्टि में हाहाकार मच गया था... ऐसे में मां काली को प्रत्यक्ष रूप में रोकने की शक्ति स्वयं देव दी देव महादेव में भी नहीं थी. तभी देवताओं के अनुरोध पर महाकाली के क्रोध को शांत करने के लिए शिव ने उनकी राह में लेटने की युक्ति लगाई थी, ताकि चराचर ब्रह्माण्ड के स्वामी और अपने पति परमेश्वर को अपने पांव के नीचे पाकर देवी शांत हों और अपने मूल रूप में वापस आएं... नवरात्रि के पावन अवसर पर देवी के अलग-अलग रूपों की आस्था के साथ आराधना की जाती है... नवरात्रि के सातवें दिन दुर्गा मां के शक्ति स्वरूपा रूप की पूजा होती है, जिन्हें मां कालरात्रि कहा जाता है. देवी दुष्टों के लिए विनाशक हैं और भक्तों के लिए रक्षक का रूप धारण कर लेती हैं... मां कालरात्र‍ि की पूजा बेहद शुभकारी होती है और पूजा से नकारात्मक शक्तियों का असर खत्म हो जाता है...  शत्रुओं और विरोधियों का नाश करने वाली मां कालरात्र‍ि की उपासना से भय, दुर्घटना और रोगों का भी नाश होता है... कहा जाता है कि माता कालरात्रि की पूजा करने से मनुष्य समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है... इतना ही नहीं माता की उपासना से शत्रु, भय, दुर्घटना और तंत्र-मंत्र के प्रभावों का समूल नाश हो जाता है... और मां काली अपने भक्तों की रक्षा करते हुए उन्हें आरोग्य का वरदान देती हैं...

मां कात्यायनी
माता भगवती का छठा अवतार हैं मां कात्यायनी.... मां कात्यायनी का पूजन नवरात्र के छठे दिन विधि-विधान से किया जाता है... नवरात्र के छठे दिन कात्यायनी देवी का पूजन करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं.. ऐसी मान्यता है क‌ि ज‌िनके व‌िवाह में बाधा आ रही है उन्हें देवी कात्यायनी की पूजा करने से लाभ म‌िलता है और व‌िवाह शीघ्र होता है.. पुराणों के मुताबिक महर्षि कात्यायन ने मां भगवती को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा के साथ वन में कठोर तपस्या की थी... महर्षि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उन्हें पुत्री का वरदान दिया था... जिसके बाद महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए त्रिदेवों के तेज से एक कन्या का जन्म हुआ.. जिसने अपनी असीम शक्ति और तेज के बल पर महिषासुर का अंत किया था... देवी कात्यायनी का स्वरुप अत्यंत विशाल और दिव्य है.. सोने की तरह चमकदार शरीर वाली मां कात्यायनी की चार भुजाएं हैं.. इनके दो हाथों में तलवार और कमल पुष्प सुशोभित हैं.. जबकि दो हाथ वर और अभय मुद्रा में अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं... देवी कात्यायनी का वाहन सिंह है... शास्त्रों के मुताबिक जो भक्त दुर्गा मां की छठी विभूति कात्यायनी की आराधना करते हैं मां की कृपा उन पर सैदव बनी रहती है... तभी तो ऐसी मान्यता है कि कात्यायनी माता का व्रत और उनकी पूजा करने से हर तरह की बाधा दूर होती है.. मां कात्यायनी की उपासना से भक्तों को अमोघ फल प्राप्त होता है... कहते हैं कि जिसने मां कात्यायनी को प्रसन्न करके उनकी कृपा प्राप्त कर ली, उसमें असंभव को भी संभव करने की शक्ति आ जाती है... यानी मां की उपासना का फल कभी नष्ट नहीं होता... कहा जाता है मां कात्यायनी ने देवताओं की प्रार्थना सुनकर महिषासुर से युद्ध किया... महिसासुर से युद्ध करते हुए मां जब थक गई तब उन्होंने शहद युक्त पान खाया... शहद युक्त पान खाने से मां कात्यायनी की थकान दूर हो गयी और महिषासुर का वध कर दिया. कात्यायनी की साधना और भक्ति करने वालों को मां की प्रसन्नता के लिए शहद युक्त पान अर्पित करना चाहिए... देवी कात्यायनी की पूजा में प्रसाद के रूप में शहद का प्रयोग शुभ माना गया है.. कहते हैं कि शहद के प्रभाव से भक्तों को देवी के समान तेज और सुंदर रूप प्राप्त होता है.... मां कात्यायनी की साधना का समय गोधूली काल है. मान्यता है कि इस समय में धूप, दीप, गुग्गुल से मां की पूजा करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती है. जो भक्त माता को पांच तरह की मिठाईयों का भोग लगाकर कुंवारी कन्याओं में प्रसाद बांटते हैं माता उनकी आय में आने वाली बाधा को दूर करती हैं और व्यक्ति अपनी मेहनत और योग्यता के अनुसार धन अर्जित करने में सफल होता है...  कहा जाता है इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है...


मां महागौरी
आज नवरात्र का आठवां दिन यानि महाष्टमी है... नवरात्र के इस सबसे बड़े दिन महाष्टमी पर देशभर में मां महागौरी की पूजा की जाती है... नौ दिनों की पूजा में आज का दिन बेहद खास माना जाता है... कहते हैं कि मां के इस रूप की पूजा से जीवन में खुशियां और शांति आती है... मां दुर्गा का आठवां स्वरूप महागौरी है. अपने इस रूप में मां आठ वर्ष की हैं. इसलिए नवरात्रि की अष्टमी को कन्या पूजन की परंपरा है... धर्मिक मान्यताओं के अनुसार महागौरी की उपासना से इंसान को हर पाप से मुक्ति मिल जाती है. शंख और चन्द्र के समान अत्यंत श्वेत वर्ण धारी माँ महागौरी... माँ दुर्गा का आठवां स्वरुप हैं। नवरात्रि के आठवें दिन देवी महागौरा की पूजा की जाती है.. माँ महागौरी शिव जी की अर्धांगिनी है। कठोर तपस्या के बाद देवी ने शिव जी को अपने पति के रुप में प्राप्त किया था। देवी महागौरी के शरीर बहुत गोरा है। महागौरी के वस्त्र और अभुषण श्वेत होने के कारण उन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा गया है। महागौरी की चार भुजाएं है जिनमें से उनके दो हाथों में डमरु और त्रिशुल है तथा अन्य दो हाथ अभय और वर मुद्रा में है। इनका वाहन गाय है। कहा जाता है भगवान शिव को पाने के लिए किये गए अपने कठोर तप के कारण माँ पार्वती का रंग काला और शरीर क्षीण हो गया था.. तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव ने माँ पार्वती का शरीर गंगाजल से धोया तो वह विद्युत प्रभा के समान गौर हो गया। इसी कारण माँ को महागौरी के नाम से पूजते हैं। नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। कई लोग इस दिन कन्या पूजन भी करते हैं। मां संगीत व गायन से प्रसन्न होती है तथा इनके पूजन में संगीत अवश्य होता है। कहा जाता है कि आज के दिन मां की आराधना सच्चे मन से होता तथा मां के स्वरूप में ही पृथ्वी पर आयी कन्याओं को भोजन करा उनका आर्शीवाद लेने से मां अपने भक्तों को आर्शीवाद अवश्य देती है। हिन्दू धर्म में अष्टiमी के दिन कन्याओं को भोजन कराए जाने की परम्परा है। माता महागौरी, मां दुर्गा की अष्टम शक्ति है जिसकी आराधना करने से भक्तजनों को जीवन की सही राह का ज्ञान होता है और जिस पर चलकर लोग अपने जीवन का सार्थक बना सकते हैं। जो भी साधक नवरात्रि में माता के इस रूप की आराधना करते हैं माँ उनके समस्त पापों का नाश करती है। अस्टमी के दिन व्रत रहकर मां की पूजा करते हैं और उसे भोग लगाकर मां का प्रसाद ग्रहण करते हैं, इससे व्यक्ति के अन्दर के सारे दुष्प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।

मां सिद्धिदात्री
आज नवरात्रि का नवां और आखिरी दिन है.. और आज नवमी तिथि को मां दुर्गा के नावें स्वरूप मां सिद्धिदात्री का पूजन किया जाता है... पुराणों के मुताबिक देवी सिद्धिदात्री के आठ सिद्धियां हैं... देवी पुराण के मुताबिक सिद्धिदात्री की उपासना करने का बाद ही शिव जी ने सिद्धियों की प्राप्ति की थी... माना जाता है कि देवी सिद्धिदात्री की आराधना करने से लौकिक और परलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती है... अंतरमन की शक्ति को जगाने का आज का दिन अत्ति उत्तम माना गया है.. साधना के आठ पड़ावों को पार करके जब साधक सिद्धिदात्री के दरबार तक पहुंच जाता है तो दुनिया की कोई भी वस्तु उसकी पहुंच से बाहर नहीं होती.. करुणामयी मां साधक की हर मुराद को पूरा कर देती हैं.. माता सिद्धिदात्री का स्वरूप ही कल्याणक और वरदायक है.. माता अपने भक्तों को वर देकर हर संघर्ष के लिए सक्षम बना देती हैं... मां सिद्धिदात्री का स्वरुप तेजोमय और शांत है.. मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है.. मां के अन्य हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए हुए हैं.. इनके गले में सफेद फूलों की माला और माथे पर तेज है... देवीपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवी की शक्तियों और महिमाओं का बखान किया गया है... मां सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को सभी सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं.. देवीपुराण के मुताबिक भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था.. माता की अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था.. औऱ भगवान शिव तीनोलोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए.. अष्ट सिद्धियों को प्राप्त कर लेने वाले साधक को मां अपने चरणों में स्थान देकर उसे भव बंधनों से मुक्त कर देती हैं और भक्तों को नौ निधियों का पात्र बना देती हैं.. मां की शरण आए भक्त के लिए दुनिया में पाने लायक कुछ नहीं रह जाता.. सिद्धिदात्री मां के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे.. माता के भक्त सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से मां भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस का निरंतर पान करता है। मां भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। माता द्वारा स्थापित परम पद को पाने के बाद माता के भक्त को किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती।